नई दिल्ली – जहांगीरपुरी में २ बच्चों को जन्म देने वाली पूजा जो एक छोटी से दुकान चलाती हैं, बच्चों का ध्यान दादी, बड़ी बहन या फिर कभी – कभी खुद मां के द्वारा रखा जाता है। पहले बच्चे के जन्म पर बहुत सारे फॉर्म्स भरने तथा बहुत अधिक मुश्किलों के बाद राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून के सेक्शन ४ बी के तहत ६००० रूपये प्राप्त हुए जबकि दूसरे बच्चे के जन्म पर काफी जद्दोजहद के बावजूद भी कोई आर्थिक मदद प्राप्त नहीं हुई।
यहाँ यह ध्यान देना ज़रूरी होगा की जिस तरह नमक के बिना सब्ज़ी अधूरी है ठीक उसी तरह मातृत्व अधिकारों के अभाव में भी महिला दिवस का कोई मतलब नहीं रह जाता और भारत देश में केवल एक पूजा नहीं ऐसी लाखों पूजाएँ रहती हैं, जिन्हें गर्भावस्था के समय अथवा प्रसव के बाद भी किसी भी तरह की सरकारी सहायता नहीं मिल पाती। जहाँ एक ओर देश भर में लोग महिला दिवस की ख़ुशी मनाने का ढोंग करते हैं, वहीँ दूसरी ओर लगभग हमारे देश की ९०त्न महिलाएं मातृत्व अधिकारों से वंचित हैं।
विश्व स्वास्थ्य सांख्यिकी (२०१६) के अनुसार, प्रति घंटा लगभग ५ महिलाएं गर्भावस्था तथा प्रसव संबंधी कठिनाइयों के कारण अपना दम तोड़ देती हैं। पूरे विश्व में होने वाली मातृ – मृत्यु का १७त्न केवल भारत में ही है। हालाँकि भारत में अधिकांश जनसँख्या आज भी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रही हैं, अल्पपोषण व् कुपोषण यहाँ बच्चों में बहुत आम बात है। पोषण में कमी व्यक्ति तथा समाज दोनों को प्रभावित करते हैं. भारत में लगभग २९त्न बच्चे कम वज़न के हैं, ७२त्न शिशु और लगभग ६०त्न महिलाओं में खून की कमी है तथा ३८त्न बच्चे छोटे कद के हैं। मातृत्व अधिकार मातृ – शिशु स्वास्थ्य में सुधार लाने के लिए बहुत आवश्यक हैं।
मातृत्व अधिकार – महिलाओं के प्रति भेदभाव तथा पाखंड:
भारत में मातृत्व अधिकार से सम्बंधित क़ानूनी हक़ अपर्याप्त रहे हैं। यहाँ इस बात पर ध्यान देना ज़रूरी होगा कि मातृत्व अधिकार क़ानून १९६१, केवल उन महिलाओं पर लागू होता है जो संगठित क्षेत्र में काम करती हैं तथा जिनकी संख्या देश की कुल महिलाओं की जनसँख्या में से १०त्न से भी कम है। मातृत्व अधिकार अधिनियम संशोधन जिसके अंतर्गत प्रसूति अवकाश १४ सप्ताह से बढ़ाकर २६ सप्ताह तक कर दिया, अगस्त २०१६ में राज्य सभा में पारित हो चुका है। क़ानून में संशोधन ही वह अवसर है, जिसके द्वारा उन सैकड़ों महिलाओं (असंगठित क्षेत्र में कार्यरत) को शामिल किया जा सकता है परन्तु मौजूदा मातृत्व अधिकार क़ानून में संशोधन के बाद भी असंगठित क्षेत्र में कार्यरत महिलाओं को शामिल न करके उनके साथ बड़े पैमाने पर होने वाले भेदभाव की अनदेखी की जा रही है। भारत में लगभग ९०त्न महिलाएं मातृत्व अधिकारों से वंचित रही हैं और क्योंकि वह मातृत्व अधिकार अधिनियम के तहत नहीं आती, तो प्रसूति के दौरान तथा बाद में उन्हें किसी भी प्रकार की आर्थिक सहायता व् अवकाश नहीं मिलता है, जिससे मां और शिशु दोनों की सेहत को खतरा होता है। जबकि यह मान्यता है की गर्भावस्था, प्रसव और स्तनपान महिलाओं के शरीर पर एक अतिरिक्त बोझ डालता है जिसके लिए महिलाओं को उनके नियमित कामों से दूर रह कर पर्याप्त आराम तथा विशेष पोषण की आवश्यकता होती है। महिलाओं को गर्भावस्था और प्रसव के तत्काल बाद की अवधि के अंतिम तिमाही के दौरान कठिन परिश्रम से बचने की आवश्यकता होती है। माह तक :छ केवल स्तनपान कई कारणों से बच्चे के सर्वोत्तम हित में है जबकि अध्ययन बताते हैं की लगभग मात्र ४०त्न बच्चे छह माह तक केवल स्तनपान नहीं करते बल्कि साथ – साथ ऊपरी आहार भी बच्चों को दिया जाता है, क्योंकि महिला को मातृत्व अधिकार के अभाव में प्रसव के बाद काम छूट जाने के डर से जल्दी से जल्दी काम पर लौटना पड़ता है, जिस कारण बच्चे को केवल मां का दूध ही नहीं मिल पाता और बच्चे की देख रेख करने वाले उसे ऊपरी आहार देने लगते हैं जिसके नतीजे भयानक कुपोषण के रूप में हम सबके सामने हैं।

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून और प्रधानमंत्री जी की बयानबाज़ी
३१ दिसंबर २०१६ को प्रधानमंत्री के द्वारा मन की बात में कहा गया कि गर्भवती महिलाओं के लिए एक योजना शुरू की जा रही है। इस के तहत सरकार गर्भवती महिलाओं को पंजीकरण, प्रसव, टीकाकरण एवं पौष्टिक आहार के लिए ६००० रूपये की आर्थिक मदद करेगी। लेकिन वहीँ दूसरी ओर मातृत्व अधिकार के लिए अपर्याप्त बजट की बात कहते हुए महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने केवल एक ही बच्चे के जन्म के लिए यह सीमा तय कर दी है। जबकि एक सच्चाई यह भी है की राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून २०१३ (हृस्नस््र सेक्शन ४(बी)) के तहत सभी गर्भवती महिलाओं के लिए ६००० रूपये की आर्थिक मदद का प्रावधान है, जो की २०१३ में ही पास हो गया था। क़ानून का ३६५ दिनों के अंदर क्रियान्वयन होना चाहिए लेकिन राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून के पास होने के ३ साल से अधिक होने के बावजूद भी केंद्र सरकार ने सभी के लिए इस योजना को अब तक कार्यान्वित नहीं किया है।
बेहद अफ़सोस की बात ये है कि महिलाओं के लिए इतनी शर्तें तो कायम कर दी हैं लेकिन क्या कभी किसी भारतीय सरकार ने इस ओर ध्यान दिया है कि भारत में महिलाओं की परिवार नियोजन में क्या भूमिका है? बाल विवाह कि शिकार बच्चियां १८ वर्ष से कम उम्र में ही बच्चों को जन्म किसकी मर्ज़ी से देती हैं? बलात्कार की शिकार बच्चियों को भी स्वास्थ्य ठीक न हो पाने के कारण बच्चे को जन्म देना पड़ता है, मृत शिशु के जन्म की स्तिथि में मातृत्व अधिकार का कोई प्रावधान नहीं है. तो क्या ये सभी मातृत्व अधिकार से वंचित रहें?

गर्भवती महिलाओं की उपेक्षा :
असंगठित क्षेत्र में काम कर रही महिलाओं को गर्भ धारण होने पर विभिन्न असहनीय परिस्तिथियों से जूझना पड़ता है। या तो उन्हें नौकरी से निकाल दिया जाता है या फिर उनके लिए इस तरह के हालात पैदा कर दिये जाते हैं जिससे उन्हें स्वयं ही नौकरी छोडनी पड़ती है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के १३१ देशों पर हुए एक अध्ययन के अनुसार महिलाओं के नौकरी छोड़ देने के मामले में भारत १३१ में से नीचे से १११ नम्बर पर है। इससे ज्ञात होता है कि महिलाओं का नौकरी छोड़ देना भारत में एक आम बात है. मौजूदा सरकार को इस विषय में विशेष ध्यान देने कि आवश्यकता है। च्च्आय में कमी और काम में हो रहे भेदभाव के खिलाफ महिलाओं की रक्षा के रूप में मातृत्व अधिकार बहुत आवश्यक हैं।
अस्पतालों तथा स्वास्थ्य केन्द्रों की दशा:
किसी भी तरह की शर्त को लागू करने से पहले हमारे समाज में उपलब्ध अस्पताल तथा चिकित्सा केन्द्रों की स्थिति का जायज़ा ज़रूर हमारी सरकार को करना चाहिए। जैसा की कहा गया है कि मातृत्व लाभ केवल संस्थागत प्रसव के द्वारा ही मिलेगा, हमारी सरकार को यह देखना चाहिए कि आज भी देश में हज़ारों ऐसे गाँव हैं जहाँ लोग आसानी से अस्पतालों तक नहीं पहुँच पाते हैं और यदि वहां तक पहुँच भी जाते हैं तो जो सुविधाएं एक गर्भवती स्त्री को मिलनी चाहियें वो उन्हें नहीं मिलती। उदाहरण के लिए: अक्सर स्वास्थ्य केन्द्रों तथा अस्पतालों में प्रसव कि पूर्ण व्यवस्था नहीं है, दवाएं नहीं हैं, साफ़ सफाई पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता है तथा गर्भवती महिला के साथ बहुत ही दुर्व्यवहार किया जाता है। शौचालय साफ़ नहीं होते, वाश बेसिन नहीं होते, पीने के लिए स्वच्छ पानी का अभाव तथा मल – मूत्र निपटान प्रणाली की सुविधा का भी अभाव रहता है जिससे नवजात शिशु के इतनी गंदगी में रहने पर संक्रमण होने की संभावनाएं और अधिक हो जाती हैं।
राज्य तथा केंद्र सरकार की ज़िम्मेदारी:
सरकार कि ज़िम्मेदारी है सभी महिलाओं के लिए सम्मानजनक जीवन जीने के लिए व्यवस्था करना। जैसे कि: कार्यस्थल पर होने वाले भेदभाव को रोकना, संस्थागत प्रसव के लिए गुणवत्तापूर्ण व्यवस्था करना, बच्चों का जीवन सुरक्षित करने के लिए पोषण तथा टीकाकरण की व्यवस्था करना इत्यादि।

मातृत्व अधिकार महिलाओं के अधिकार हैं, जो सभी महिलाओं को बिना किसी शर्त के मिलने ही चाहियें। यह मां तथा शिशु के स्वस्थ जीवन के साथ – साथ राज्य के विकास के लक्ष्य को हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। लेकिन मातृत्व अधिकार नाम का फूल यदि केवल संगठित क्षेत्रों में काम करने वाली महिलाओं को ही दिया जायेगा तो असंगठित क्षेत्रों में काम करने वाली बाकी ९०त्न से भी अधिक महिलाएं मातृत्व अधिकार नामक इस फूल की केवल खुशबू ही महसूस कर सकेंगी।आयशा
सचिवालय समन्वयक – रोज़ी रोटी अधिकार अभियान

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