2017 के विधानसभा चुनाव में  भाजपा ने पांच (उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा, मणिपुर) में से उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में तीन चैथाई बहुमत के साथ अप्रत्याशित जीत दर्ज की है। इन नतीजों से साफ होता है की भाजपा के खिलाफ देश में कहीं भी सत्ता विरोधी लहर नहीं है। और मोदी लहर आज भी कायम है। जिस नोटबंदी के बारे में कहा जा रहा था कि इससे भाजपा को पाँचों राज्यों (उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा, मणिपुर) के चुनावों में भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है, लेकिन देश की जनता ने चुनावों में भाजपा के समर्थन में वोट देकर नरेन्द्र मोदी सरकार की नोटबंदी पर भी मुहर लगा दी है। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में  विपक्ष का सूफड़ा साफ होता नजर आ रहा है। मणिपुर में भाजपा अप्रत्याशित करती नजर आ रही है। गोवा विधानसभा के लिए त्रिशंकु जनादेश मिला है और कांग्रेस पार्टी सिंगल लार्जेस्ट पार्टी के रूप में उभरी है। अगर पंजाब के बारे में बात की जाए तो पंजाब में भाजपा, शिरोमणि अकाली दल की सहयोगी पार्टी है। भारतीय जनता पार्टी ने पंजाब में अपनी जीत को लेकर कोई बड़ा दावा नहीं किया था। भारतीय जनता पार्टी ने पहले ही संकेत दे दिया था कि उसे पंजाब में सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ सकता है और पंजाब के नतीजों में यह दिखा भी है। पंजाब में कांग्रेस पार्टी दो तिहाई बहुमत से सरकार बना रही है।

अगर उत्तर प्रदेश की बात की जाए तो सबसे ज्यादा साख इन विधानसभा चुनावों में भाजपा की दांव लगी थी। क्योंकि भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनावों में 73 सीट जीतकर एक रिकॉर्ड कायम किया था। और भाजपा 336 विधानसभा सीटों पर पहले स्थान पर रही थी।  उत्तर प्रदेश की राजनीति में भाजपा पिछले 14 सालों से वनवास भोग रही थी। इसलिए भाजपा के लिए 2014 के लोकसभा चुनावों के प्रदर्शन को दोहराने की चुनौती थी। भाजपा ने उत्तर प्रदेश में अपनी अप्रत्याशित जीत से अपना 2014 के लोकसभा वाला प्रदर्शन दोहराया है। उत्तर प्रदेश में भाजपा 324 सीटों के साथ तीन चैथाई बहुमत से ज्यादा सीटों से सरकार बना रही है। जिस प्रकार भगवान् श्री राम ने 14 वर्ष का वनवास भोगकर अयोध्या की राजगद्दी संभाली थी उसी प्रकार भाजपा ने भी उत्तर प्रदेश मे अपना 14 साल का वनवास खत्म कर लिया है। कहा जाए तो 14 साल बाद उत्तर प्रदेश में केसरिया झंडा लहराएगा।

उत्तर प्रदेश के चुनाव में अखिलेश यादव और राहुल गाँधी के साथ को जनता ने पूरी तरह से नकार दिया है। जनता के इस फैंसले से नजर आता है कि उत्तर प्रदश की जनता को समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का साथ पसंद नहीं आया है। इस चुनाव में समाजवादी पार्टी 47 सीटों पर सिमट कर रह गयी है। अखिलेश यादव ने चुनावों से पहले अपने परिवार से लड़-झगड़कर दबंगई से समाजवादी पार्टी की कमान अपने हाथ में ले ली और अपने पिता मुलायम सिंह यादव और चाचा अखिलेश यादव को हांशिये पर धकेल दिया। चुनावी नतीजों से दिखता है कि प्रदेश कि जनता को अखिलेश यादव का यह रवैया बिलकुल भी पसंद नहीं आया। अखिलेश यादव ने चुनावों से पहले ‘‘काम बोलता है’’ नारा दिया था लेकिन चुनावी नतीजों ने अखिलेश यादव की बोलती जरूर बंद कर दी है। अगर कांग्रेस की बात की जाए तो कांग्रेस के लिए प्रदेश में खोने के लिए कुछ नहीं था। कांग्रेस पार्टी ने 7 सीटों पर जीत दर्ज की है। कांग्रेस पार्टी सोच रही थी कि अपने उपाध्यक्ष राहुल गाँधी के नेतृत्व में समाजवादी से गठबंधन करके सत्ता तक पहुंचेगी। इसके लिए कांग्रेस पार्टी ने उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की जूनियर पार्टी भी बनना स्वीकार किया। लेकिन उत्तर प्रदेश कि जनता ने कांग्रेस पार्टी के सपने को चूर-चूर कर दिया। कहा जाए तो इस हार का अंदाजा कांग्रेस पार्टी को पहले ही हो गया था इसलिए कांग्रेस पार्टी कि अध्यक्ष सोनिया गाँधी भी पूरे चुनाव अभियान में चुनाव प्रचार से दूर रहीं। और कांग्रेस के लिए तुरुप का पत्ता माने जानी वालीं प्रियंका गांधी भी एक-दो कार्यक्रमों को छोड़कर प्रदेश में ज्यादा सक्रिय नहीं रहीं।

इस चुनाव में सबसे ज्यादा दुर्गति जिसकी हुई है तो वो बहुजन समाज पार्टी की हुई है। बहुजन समाज पार्टी 19 सीटों पर सिमट कर रह गयी है। इन विधानसभा चुनावों में मायावती ने फिर सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला अपनाया था। इस बार मायावती का खास फोकस मुस्लिम मतदाताओं पर था। इसलिए मायावती ने चुनावों से पहले बाहुवली और आपराधिक छवि के मुख्तार अंसारी तक को अपनी पार्टी में शामिल कराया और अपनी पार्टी से चुनाव भी लड़ाया। मायावती को उम्मीद थी कि सपा की पारिवारिक कलह में दोराहे पर खड़े मुस्लिम मतदाता बसपा का रूख करेंगे। इसलिए मायावती ने इन चुनावों में 97 मुस्लिम उम्मीदवारों को प्रदेश में टिकट दिया था। इसके साथ-साथ मायावती ने 87 टिकट दलितों, 106 टिकट पिछड़े वर्ग और 113 टिकट अगड़े वर्ग के उम्मीदवारों को दिए थे। लेकिन मायावती की सोशल इंजीनियरिंग मोदी लहर और भाजपा की आंधी में ध्वस्त हो गयी। चुनावी नतीजों से मायावती के लिए अब राज्यसभा की भी डगर मुश्किल हो गयी है। कहा जाए तो मायावती अब राज्यसभा की अपनी सीट भी जीतने में सक्षम नहीं रह गयी हैं।

उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय लोकदल की बात की जाये तो नतीजों से साफ होता है कि अब लोकदल और चैधरी अजित सिंह के लिए अपने अस्तित्व को बचाने की चुनौती होगी। राष्ट्रीय लोकदल 1 सीट पर सिमट कर रह गया है। चैधरी अजित सिंह समझ रहे थे कि जाट आरक्षण की वजह से जाट मतदाता भाजपा से छिटक कर उनके पाले में आएगा। क्योंकि 2014 के लोकसभा चुनाव में कभी चैधरी अजित सिंह के परंपरागत वोट बैंक माने वाले जाट मतदाताओं ने भाजपा का रूख किया था। लेकिन कुछ समय से जाट आरक्षण को लेकर जाट मतदाता भाजपा से नाराज चल रहा था, चैधरी अजित सिंह को आशा थी कि जाट मतदाता उनका समर्थन करेगा। लेकिन जाट बेल्ट वाले क्षेत्रों के नतीजे देखकर लगता है कि जाटों ने खुलकर भाजपा को समर्थन किया है।

उत्तर प्रदेश के चुनाव के नतीजों का विश्लेषण किया जाए तो उत्तर प्रदेश की जनता ने भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग को पसंद किया है। वैसे तो यह चुनाव भारतीय जनता पार्टी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे पर ही लड़ा था। लेकिन पार्टी के अध्यक्ष के नाते अमित शाह की भी अग्नि परीक्षा थी। इसके अलावा जिन चार चेहरों (राजनाथ सिंह, उमा भारती, कलराज मिश्र और प्रदेश अध्यक्ष के नाते केशव प्रसाद मौर्या) को भाजपा ने आगे रखा वो रणनीति अप्रत्याशित नतीजों से कामयाब होती नजर आयी है। कहा जाए तो मोदी लहर ने उत्तर प्रदेश में पूरी तरह से काम किया।

उत्तराखंड की बात की जाए तो उत्तराखंड में भी नतीजों में भाजपा अप्रत्याशित रूप से जीती है। भाजपा तीन चैथाई के प्रचंड बहुमत से 57 सीटों के साथ उत्तराखंड में अपनी सरकार बना रही है। कांग्रेस ने उत्तराखंड में सिर्फ 11 सीटों पर जीत दर्ज की है। उत्तराखंड में कांग्रेस की हरीश रावत सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर के साथ-साथ कांग्रेस पार्टी की आपसी कलह ने काम किया है। उत्तराखंड में कांग्रेस के ज्यादातर बड़े नेता भाजपा में शामिल हो चुके थे। इसलिए चुनावों का सारा दामोरदार हरीश रावत के कन्धों पर था। कहा जाए तो हरीश रावत कांग्रेस में अकेले पड़ गए थे। इसका पूरा-पूरा फायदा उत्तराखंड में भाजपा ने उठाया और यह नतीजों में भी साफ दिख रहा है। हरीश रावत खुद अपनी दोनों विधानसभा सीटों से चुनाव हार गए।

इन पांच राज्यों में पहले से गोवा में भाजपा की सरकार थी। पंजाब में भाजपा और शिरोमणि अकाली दल की गठबंधन सरकार थी। गोवा के नतीजों में कांग्रेस पार्टी 17 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है और भाजपा 13 सीटों के साथ दूसरे नंबर की पार्टी बनी है। कहा जाए तो गोवा में त्रिशंकु विधानसभा बनती हुई नजर आ रही है। गोवा में छोटी-छोटी पार्टियों (महाराष्ट्रवादी गौमांतक पार्टी 3 सीट, गोवा फॉरवर्ड पार्टी 3 सीट, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी 1 सीट) और निर्दलीय विधायकों (3 सीट) की सरकार बनाने में अहम् भूमिका रहेगी।

इन पांच राज्यों में भाजपा को जिस राज्य में हार का सामना करना पड़ा है वो पंजाब है यहाँ कांग्रेस और आम आदमी पार्टी से त्रिकोणीय मुकाबले में भाजपा और शिरोमणि अकाली दल की गठबंधन सरकार को सत्ता विरोधी लहर के चलते करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा है। कहा जाए तो पंजाब में भाजपा से ज्यादा शिरोमणि अकाली दल की हार है। क्योंकि शिरोमणि अकाली दल के प्रति लोगों का गुस्सा था और बादल परिवार पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे थे। कांग्रेस पार्टी ने कैप्टन अमरिंदर सिंह के नेतृत्व में पंजाब में अप्रत्याशित जीत दर्ज की है और 77 सीटों पर जीत दर्ज करने के साथ प्रचंड बहुमत पाया है। शिरोमणि अकाली दल को 15 सीटों पर जीत मिली है और भाजपा 3 सीटों पर चुनाव जीती है। पाँचों राज्यों से कांग्रेस के लिए खुशी की खबर सिर्फ पंजाब से ही है। लेकिन पंजाब में कांग्रेस की जीत में शीर्ष नेतृत्व से ज्यादा भूमिका कैप्टन अमरिंदर सिंह और पंजाब राज्य के कांग्रेस कार्यकर्ताओं की है। पंजाब में भाजपा के बारे में बात की जाए तो वहां भाजपा के लिए ज्यादा स्कोप वैसे भी नहीं था। पंजाब में आम आदमी पार्टी का 20 सीटों के साथ नंबर दो पार्टी के रूप में उभरना अरविन्द केजरीवाल और पंजाब के आम आदमी पार्टी के नेताओं के लिए एक उपलब्धि की तरह है।

पाँचों राज्यों में मणिपुर में भाजपा की जीत एक जैकपोट की तरह है। मणिपुर की जीत से भाजपा पूर्वोत्तर के राज्यों में भी कांग्रेस को चुनौती देती हुई नजर आ रही है  भारतीय जनता पार्टी को आमतौर पर उत्तर भारत की पार्टी माना जाता था लेकिन भाजपा ने पहले असम में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई और अरुणाचल प्रदेश में भी पेमा खांडू के नेतृत्व में भाजपा की सरकार काम कर रही है। अब 2017 के पांच विधानसभाओं के चुनाव में मणिपुर जैसे राज्य में तीन बार के मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस पार्टी को कड़ी टक्कर देना पूर्वोत्तर राज्यों में कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। मणिपुर में कांग्रेस बेशक 26 सीटों के साथ नंबर एक की पार्टी के रूप में उभरी हो लेकिन भाजपा ने 21 सीटें जीतकर मणिपुर में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है। नागा पीपुल्स फ्रंट और नेशनल पीपुल्स पार्टी ने क्रमशः 4, 4 सीटों पर जीत दर्ज की है। तृणमूल कांग्रेस, लोकजनशक्ति पार्टी ने क्रमशः 1,1 सीट पर जीत दर्ज की है। इसके साथ ही एक निर्दलीय उम्मीदवार ने भी जीत दर्ज की है। जिस मणिपुर विधानसभा में भाजपा के न के बराबर विधायक थे वहां अब भाजपा मजबूत नंबर दो की स्थिति में है। कहा जाए तो भाजपा छोटी-छोटी पार्टियों को लेकर सरकार भी बना सकती है। भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए मणिपुर की जीत एक बड़ी उपलव्धि की बात है। कांग्रेस पार्टी भी मणिपुर में सिर्फ कुछ सीटों से ही बहुमत से दूर है। कांग्रेस भी किसी छोटी पार्टी से गठबंधन कर सरकार बना सकती है।

गौरतलब है कि उत्तराखंड, पंजाब, और गोवा में एक चरण में  मतदान कराया गया था। मणिपुर में दो चरण में मतदान हुआ और देश की सबसे बड़ी विधानसभा उत्तर प्रदेश में सात चरणों में चुनाव संपन्न कराये गए। पंजाब में 117 सदस्यीय विधानसभा के लिए और गोवा की 40 सदस्यीय विधानसभा के लिए 04 फरवरी 2017 को मतदान हुआ था। उत्तराखंड में 70 सदस्यीय विधानसभा के लिए 15 फरवरी  2017 को लोगों ने  नयी सरकार चुनने के लिए मतदान किया था। मणिपुर की 60 सदस्यीय विधानसभा के लिए दो चरणों में 04 मार्च और 08 मार्च को मतदान हुआ था। जनसँख्या की दृष्टि से देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की 403 सदस्यीय विधानसभा के लिए 7 चरणों में क्रमशः 11 फरवरी, 15 फरवरी, 19 फरवरी, 23 फरवरी, 27 फरवरी, 04 मार्च और 08 मार्च को मतदान हुआ था।

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में चार विधानसभा चुनावों में भाजपा की जीत ने पीएम नरेंद्र मोदी की नीतियों पर भी मुहर लगायी है। चार राज्यों में जीत आने वाले समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देश में आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने और कड़े फैसले लेने में मदद करेगी। इस जीत से पीएम मोदी के उन आलोचकों को भी करारा जवाब मिल गया है जो 2014 लोकसभा चुनाव के बाद मोदी लहर को नकार रहे थे। कहा जाए तो उत्तर प्रदेश सहित उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा में मोदी लहर ने पूरी तरह से काम किया है। उत्तर प्रदेश सहित चार राज्यों में भाजपा की जीत से साफ होता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता जनता के बीच पहले की तरह आज भी कायम है, जैसी लोकसभा चुनावों के वक्त थी। चुनाव से पहले देश की सभी विपक्षी पार्टियां दावा कर रही थीं कि नोटबंदी के बाद लोगों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के खिलाफ गुस्सा है। लेकिन भाजपा को चुनावों में नोटबंदी का कोई नुकसान नहीं होता नजर आया बल्कि भाजपा की अप्रत्याशित जीत से नोटबंदी पर जनता की मुहर लगती हुई नजर आ रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विधानसभा चुनावों में जमकर प्रचार किया था। खासकर सांतवें और अंतिम चरण में अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी में पीएम लगातार तीन दिन तक जमे रहे। पीएम ने दो बार रोड शो किया और ताबड़तोड़ रैलियां कीं। जिसका भाजपा को सकारत्मक परिणाम मिला है।

वैसे तो सभी राज्यों में जीत के अपने महत्व है लेकिन उत्तर प्रदेश में तीन चैथाई की बहुमत सरकार बनने से भाजपा का मनोबल काफी ऊंचा है। 2017 के अंत में गुजरात और हिमाचल प्रदेश में भी चुनाव हैं और लोकसभा चुनावों में भी  करीब अब दो साल बचे हैं। उत्तर प्रदेश सहित चार राज्यों में भाजपा की यह जीत आगामी अन्य राज्यों के विधानसभा चुनावों और लोकसभा चुनाव के लिए एक आधार बनाएगी जिससे भाजपा सम्पूर्ण देश में नई राजनीतिक ऊंचाइयां छूने की कोशिश करेगी। दूसरी ओर अब विपक्षी पार्टियों को नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी को घेरने और रोकने के लिए नई रणनीति और समीकरण बनाने की आवश्यकता पड़ेगी। होली पर्व पर मोदी लहर में भाजपा की जीत ने भारतीय जनता पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं का होली पर मजा दोगुना कर दिया है। होली के साथ-साथ देश भर में भाजपा के कार्यकर्ता पटाखे फोड़कर दिवाली जैसा माहौल भी है। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड में भाजपा की जीत से पूरी भारतीय जनता पार्टी में जोश, उत्साह, उमंग और जश्न का माहौल है। भाजपाइयों द्वारा गुलाल और रंग लगाकर जीत का जश्न मनाया जा रहा है। नतीजों से साफ है कि होली के दिन भाजपा उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश में केसरिया होली खेलने की तैयारी कर रही है।

लेखक

– ब्रह्मानंद राजपूत, दहतोरा, शास्त्रीपुरम, सिकन्दरा, आगरा

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