नई दिल्ली, लाइव (सुखबीर सिमी )कहा जाता है ईश्वर को पाने के लिए साधना करनी पड़ती है , कठिन साधना, घोर तप, खुद को ईश्वर की भक्ति में जलाना पड़ता है , और अगर आपकी साधना सच्ची है , तब कहीं जा कर ईश्वर की प्राप्ति होती है। गुरुबानी में भी लिखा है “जिन प्रेम कियो तिन ही प्रभु पायो “, मतलब साफ़ है , प्रेम उस ईश्वर से उसकी आराधना से। बिलकुल वैसे जैसे मीरा ने इकतारे से आराधना कर ही कृष्ण को पाया था। बाइबिल में भी लिखा है “sing psalms and hymns and spiritual songs among yourselves and make music to the lord in your heart” अर्थात ईश्वर की भक्ति के गीत गओ और संगीत के माध्यम से अपने भीतर के ईश्वर को याद करो
अब सवाल ये की आराधना करें तो करें कैसे ? चलिए आप ही बताइये, आपने अमूमन लोगों को किस तरह से ईश्वर की आराधना करते हुए देखा है…?
मुझे यकीन है आप भी यही कहेंगे की भजन कीर्तन कर के ईश्वर का नाम लेते लोगों को देखा है। या नृत्य कर के ईश्वर को खुश करने की कोशिश करते लोगों को देखा है। लेकिन कभी आपने सोचा है की मौसिकी या संगीत से ही ईश्वर को क्यों खुश किया जाता है ? इसका कारन है की मनुष्यों को संगीत की सौगात ईश्वर ने ही दी है। इसीलिए संगीत सुन के या गा के किसी भी प्रकार के तनाव को दूर किया जा सकता है।
भगवान् शिव को नटराज कहा गया है और संगीत की देवी सरस्वती। फिर क्यों नृत्य और संगीत में रूचि रखने वाली बेटियों को घृणा की नज़र से देखा जाता है ?
और हां ये सौगात सब की साझी है। हर पुरुष और हर स्त्री की। फिर न जाने क्यों कुछ धर्म के ठेकेदारो को ये बात समझ नही आती कि रियाज़ करना ईश्वर की साधना ही है। फिर क्यों एक 16 साल की बच्ची को आराधना करने से रोका जाता है ? फतवे जारी किये जाते हैं ?
नाहिद आफरीन हों या कंदील बलोच , संगीत से जुड़ने वाली हर मुसलमान लड़की इन धर्म के ठेकेदारों को अपनी दुश्मन क्यों लगती है ? ये डर है या जलन ? डर इस बात का कि संगीत से आराधना करते करते कहीं ये बेटियां ईश्वर को न पा लें या इस बात की जलन कि आपकी दिखाई हुई राह पर न चल कर अपना रास्ता अख्तियार कर ये बेटियां ईश्वर को न पा लें ?
पर सोचिये की आखिर कंदील बलोच के सगे भाई ने ही उसके खून से अपने हाथ रंगे ,ये उसका डर था और जलन भी थी। वो क्या है न बेटियों आज़ादी बर्दाश्त करने की आदत नहीँ है वार्ना यहाँ एक आतिफ असलम भी तो है , करोड़ों फैन हैं जिनके , हर तरह का गाना गाते हैं, संगीत के धुरंधर हैं। पर उनके खिलाफ किसी तरह का फ़तवा सुना है कभी ? नहीँ न ! बस यही है मानसिकता का फर्क जो शायद कभी ख़तम न हो पायेगा।

ज़ायरा वसीम हो या माहिरा खान , बेवजह संकीर्ण मानसिकता वाले पुरुषों के आगे झुक कर माफ़ी मंगवाई जाती है , सिर्फ इस लिए की आपके अहम को ठेस न पहुंचे की आप पुरुष हो कर भी कुछ नही कर पाए और ये लड़कियां हो कर भी बुलंदी की शिखर पर हैं।
असल में यह जलन है आपके पुरुष हो कर भी इस बात को न स्वीकारने की कि आपकी निशानदेही के बिना भी लड़कियां आगे कैसे बढ़ रही हैं। उन्हें रोकने के लिए क्या क्या किया जा सकता है। जिस तरह बच्चीयों की पढ़ाई के लिए अपने सर में गोली खाने वाली मलाला को रोकने की कोशिश की गयी। सिर्फ इस बात का डर था की ये बच्चियां अगर पढ़ लिख गयीं तो आपकी और आपकी खोखली तहरीरों की असलियत जान जाएंगी और खुद को पहचान जाएँगी । और अगर खुद को पहचान गयीं तो आपको कौन पूछेगा , आपसे कौन डरेगा , किसको दबा के रखेंगे आप ?
है न सोचने वाली बात।
जब सृष्टि की रचना ही ईश्वर ने की है , हर कण में ईश्वर है , हर जीव में ईश्वर है , संगीत और विद्या जैसी सौगातें ईश्वर ने दी हैं , तो कैसे कहियेगा की लड़के यह आराधना कर सकते हैं पर लड़कियां नही।

सुखबीर सिमी

टीवी एंकर

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