भारत के राजस्थान में स्थित है विख्यात पक्षी अभयारण्य केवलादेव घना राष्ट्रीय उद्यान। इसको पहले भरतपुर पक्षी विहार के नाम से जाना जाता था। इस पक्षी विहार में हजारों की संख्या में दुर्लभ और विलुप्त जाति के पक्षी पाए जाते हैं, जैसे साईबेरिया से आये सारस, जो यहाँ सर्दियों के मौसम में आते हैं। कहते हैं कि ये स्‍थान करीब 230 प्रजाति के पक्षियों का घर है। सालों से भारत का एक बहुत बड़ा पर्यटन स्थल और केन्द्र बन चुका है। इसको 1971 में संरक्षित पक्षी अभयारण्य घोषित किया गया था। इसके बाद साल 1985 में इसे यूनेस्को की विश्व विरासत भी घोषित कर दिया गया।

अभ्‍यारण का इतिहास

प्राकृतिक ढाल होने के कारण वर्षा के दौरान यहां अक्सर बाढ़ आती थी, इसलिए भरतपुर के शासक महाराजा सूरजमल ने अपने शासन काल यहां अजान बाँध का निर्माण करवाया, जो दो नदियों गँभीरी और बाणगंगा के संगम पर बनवाया गया था। संरक्षित वन क्षेत्र घोषित किये जाने से पहले सन 1850 में केवलादेव का इलाका भरतपुर राजाओं की निजी शिकारगाह हुआ करता था, जहां वे और उनके शाही मेहमान मुर्गाबियों का शिकार किया करते थे। अंग्रेज़ी शासन के दौरान कई वायसरायों और प्रशासकों ने यहां हजारों की तादाद में बत्तखों और मुर्गाबियों का संहार किया था।

ऐसे आयें

भरतपुर, आगरा से बस 35 किलोमीटर है, जहां के हवाई अड्डे से प्रतिदिन दिल्ली, बनारस, लखनऊ और मुम्बई की उड़ानें हैं। भरतपुर दिल्ली-बंबई मार्ग पर बड़ी लाइन की कई रेलगाड़ियों से जुड़ा है। राष्ट्रीय राजमार्ग समेत सड़क मार्गों से भरतपुर का संपर्क देश के कई भागों से है। यहां से दिल्ली 184 किलोमीटर, जयपुर 175, अलवर, 117 और मथुरा 39 किमी पर है और सबके बीच नियमित बस सेवाएँ हैं।

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