देहरादून: चौपहिया के स्थायी ड्राइविंग लाइसेंस में जुगाड़बाजी बंद होने के बाद आवेदकों की असलियत सामने आने लगी है। दरअसल, जब मैनुअल तरीके से लाइसेंस बन रहे थे तब दलाल आवेदकों के आए बगैर ही जुगाड़ भिड़ाकर लाइसेंस बनवा देते थे, मगर प्रक्रिया ऑनलाइन व सिम्युलेटर टेस्ट अनिवार्य होने के बाद आवेदकों को खुद

आरटीओ कार्यालय आकर कंप्यूटर पर परीक्षा देनी पड़ रही है। स्थिति यह है कि 15 जुलाई को सिम्युलेटर अनिवार्य होने के बाद से 16 अगस्त तक 898 आवेदकों में से 344 फेल हुए, जबकि 17 अगस्त से अब तक 462 आवेदकों में से 178 आवेदक फेल हो चुके हैं।

बता दें कि ट्रांसपोर्ट पायलेट प्रोजेक्ट के तहत दून में सात दिसंबर 2015 को लर्निंग लाइसेंस की प्रक्रिया ऑनलाइन कर दी गई थी। फरवरी 2016 से परमानेंट डीएल की प्रक्रिया भी ऑनलाइन हो गई। पासपोर्ट की तर्ज पर आवेदकों को ऑनलाइन आवेदन कर आरटीओ कार्यालय परीक्षा देने आना पड़ता है। उन्हें कंप्यूटर पर परीक्षा देनी होती है, जहां उनके फिंगर प्रिंट और चेहरे का मिलान होता है।

इसके साथ ही विभाग ने चौपहिया चालकों का परमानेंट डीएल बनाने के लिए सिम्युलेटर टेस्ट भी अनिवार्य कर दिया, इससे जुगाड़बाजी बंद हो गई। सिम्युलेटर के बाद कार चलाकर भी परीक्षा देनी पड़ रही है। इसी कारण गत आठ माह में पंद्रह हजार आवेदकों में से ढाई हजार आवेदक लर्निंग लाइसेंस परीक्षा में फेल हो गए। इन्हें न तो सुरक्षित परिवहन की जानकारी थी, न ही यातायात के नियमों की।

आरटीओ सुधांशु गर्ग ने बताया कि केंद्र सरकार की ओर से जारी गाइड लाइन के अनुसार ड्राइविंग लाइसेंस बनाने में सख्ती जरूरी है। असफल आवेदकों को एक माह बाद दोबारा परीक्षा का मौका दिया जाता है, लेकिन अगर वे दोबारा फेल होते हैं तो मौका तीन माह बाद मिलता है।

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