पटना। अपने और माता-पिता के सपनों को तो लगभग हर इंसान साकार करने की इच्छा रखता है। लेकिन समाज में ऐसे लोग बहुत कम होते हैं, जो गरीब और अभावहीन बच्चों के सपनों को पूरा करना ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लेते हैं। इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए वे दिन-रात की मेहनत करते हैं।

एेसे ही एक शख्स हैं पटना के गणितज्ञ आनंद कुमार, जिनका एक ही लक्ष्य अभावहीन और गरीब बच्चों को आइआइटियन बनाना। आज दुनिया आनंद कुमार को सुपर 30 संस्था के संस्थापक के रूप में जानती है। हर साल आईआईटी रिजल्ट्स के दौरान उनके सुपर 30 की चर्चा अखबारों में खूब सुर्खियां बटोरती हैं। साल 2003 से हर साल आईआईटी में सुपर 30 से आए बच्चे सफलता हासिल कर रहे हैं।

लेकिन, इतनी बड़ी कामयाबी आनंद कुमार को यूं ही नहीं मिली। इसके पीछे उनकी जिंदगी का लंबा संघर्ष और मजबूत इरादों की बहुत भावुक और संघर्षमयी प्रेरक कहानी है।

आनंद कुमार का परिवार बहुत साधारण मध्यवर्गीय परिवार था। पिता पोस्टल विभाग में क्लर्क थे। बच्चों को अंग्रेजी स्कूल में पढ़ाने का खर्च निकालना उनके लिए मुश्किल था। इसलिए बच्चों को हिंदी माध्यम के सरकारी स्कूल में ही पढ़ाया। बच्चों की शिक्षा के प्रति वे बहुत जागरूक थे। आनंद भी जानते थे कि उन्हें मौजूदा सीमित साधनों से ही जितना बेहतर हो सकता है वह करना है।

गणित में आनंद की विशेष रुचि थी और वे बड़े होकर इंजीनियर या वैज्ञानिक बनना चाहते थे। सभी ने कहा यदि इंजीनियर या वैज्ञानिक बनना चाहते हो तो विज्ञान विषय को ध्यान से पढ़ो। आनंद ने पटना विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। जहां उन्होंने गणित के कुछ फॉर्मूले इजाद किए।

इन फॉर्मूलों को देखने के बाद आनंद के अध्यापक देवीप्रसाद वर्मा जी ने उन्हें इन फॉर्मूलों को इंग्लैंड भेजने और वहां प्रकाशित कराने की सलाह दी। गुुरुजी के कहे अनुसार आनंद ने अपने पेपर्स इंग्लैंड भेजे और पेपर्स प्रकाशित भी हो गए। फिर कैम्ब्रिज से आनंद को बुलावा आ गया। गुरुजी ने कहा बेटा कैम्ब्रिज जाओ और अपना नाम रौशन करो। आनंद के घर में भी खुशी का माहौल था। हर कोई आनंद को बधाईयां दे रहा था।

आनंद के कैम्ब्रिज जाने के लिए सबसे बड़ी समस्या पैसे की आ रही थी। कॉलेज ने कहा कि हम सिर्फ ट्यूशन फीस माफ कर सकते हैं। कैम्ब्रिज जाने और रहने के लिए लगभग पचास हजार रुपयों की जरूरत थी। आनंद के पिताजी ने अपने ऑफिस में बेटे की आगे की पढ़ाई के लिए पैसों की मदद की मांग रखी और दिल्ली कार्यालय तक पत्राचार हुआ।

आनंद की काबलियत को देखते हुए दिल्ली ऑफिस से मदद का भरोसा दिया गया। एक अक्तूबर 1994 को आनंद को कैम्ब्रिज जाना था लेकिन कहते हैं न होता वही है जो नियति को मंजूर होता है। 23 अगस्त 1994 को आनंद के पिताजी का देहांत हो गया। इस घटना ने न केवल आनंद की जिंदगी बदल ली बल्कि पूरे परिवार को घोर आर्थिक संकट में भी डाल दिया।

घर में पिताजी ही अकेले कमाने वाले थे। चाचा अपाहिज और अब पूरे संयुक्त परिवार की जिम्मेदारी आनंद के कंधों पर आ गई। ऐसे में आनंद ने कैम्ब्रिज जाने का विचार छोड़ दिया और पटना में रहकर ही परिवार के भरण पोषण में लग गए। पिता की मौत के साथ ही जैसे आनंद का कैरियर भी समाप्त हो गया था। अच्छा यह था कि अब तक आनंद की ग्रेजुएशन पूरी हो चुकी थी।

बेशक हालात नाजुक थे लेकिन आनंद जिंदगी भर क्लर्क की नौकरी नहीं करना चाहते थे इसलिए उन्होंने पिता की अनुकंपा से प्राप्त नौकरी नहीं करने का निश्चय किया। अब आनंद अपने प्रिय विषय गणित पढ़ाकर ही थोड़ा बहुत पैसा कमाने लगे।

लेकिन जितना वे कमा रहे थे उससे घर का खर्च पूरा नहीं हो पा रहा था इसलिए आनंद की माताजी ने घर में पापड़ बनाने शुरू किया और आनंद रोज शाम को चार घंटे मां के बनाए पापड़ों को साइकिल में घूम-घूम कर बेचते। ट्यूशन और पापड़ से हुई कमाई से घर चलता। आखिर ऐसा कब तक चलेगा आनंद यही सोचते रहते। फिर आनंद ने गणित को आधार बनाया और रामानुजम स्कूल ऑफ मैथेमेटिक्स खोला।

इस स्कूल में हर तरह की प्रवेश परीक्षा की तैयारी करने वाले छात्रों को कोचिंग कराई जाने लगी। कोई छात्र सौ रुपए देता, कोई दो सौ तो कोई तीन सौ रुपए। आनंद रख लेते, किसी से पैसे को लेकर बहस नहीं करते। आनंद ने इस कोचिंग सेंटर में दो बच्चों को पढ़ाने से शुरुआत की और देखते ही देखते बच्चों की संख्या तेजी से बढ़ती चली गई और जगह कम पडऩे लगी। फिर आनंद ने एक बड़े हॉल की व्यवस्था की और पांच सौ रुपए की सालाना फीस निश्चित कर दी।

एक बार आनंद के पास अभिषेक नाम का एक बच्चा आया और बोला, सर हम गरीब हैं मैं पांच सौ रुपए आपको एक साथ नहीं दे पाऊंगा। किश्तों में दे सकूंगा, जब मेरे पिताजी खेत से आलू निकालेंगे और वे आलू बिक जाएंगे, तब। अब सवाल पटना में रहने और खाने का खड़ा हुआ।

उस बच्चे ने बताया कि वह एक नामी वकील के घर की सीढिय़ों के नीचे रहता है। इस घटना के दो-तीन दिन के बाद जब आनंद वहां गए तो देखा वह लड़का भरी दोपहरी में सीढिय़ों के नीचे पसीने से भीगा हुआ बैठा था और गणित की किताब पढ़ रहा था। इस घटना ने आनंद को झकझोर दिया।

घर आकर आनंद ने अपनी मां और भाई को उस बच्चे के बारे में बताया और कहा कि हमें ऐसे बच्चों के लिए भी कुछ करना चाहिए जिनमें पढऩे की लगन है लेकिन आर्थिक आभाव के चलते वे पढ़ नहीं पाते। मां ने भी इस विचार में अपनी सहमति जताई। फिर प्रश्न यह खड़ा हुआ कि अगर साल में तीस ऐसे गरीब बच्चों को चुना भी जाए तो वे रहेंगे कहां, खाएंगे क्या?

फिर आनंद ने एक मकान लेने की योजना बनाई ताकि सभी बच्चे वहां रह सकें। तीस बच्चों के लिए भोजन पकाने का काम आनंद की मां ने अपने हाथ में ले लिया। इस प्रकार आनंद का सुपर 30 इंस्टीट्यूट खोलने का सपना पूरा हो गया।

सन 2002 में आनंद ने सुपर 30 की शुरुआत की और तीस बच्चों को नि:शुल्क आईआईटी की कोचिंग देना शुरु किया। पहले ही साल यानी 2003 की आईआईटी प्रवेश परीक्षाओं में सुपर 30 के 30 में से 18 बच्चों को सफलता हासिल हो गई। उसके बाद 2004 में 30 में से 22 बच्चे और 2005 में 26 बच्चों को सफलता मिली। इस प्रकार सफलता का ग्राफ लगातार बढ़ता गया। सन 2008 से 2010 तक सुपर 30 का रिजल्ट सौ प्रतिशत रहा।

सुपर 30 को मिल रही अपार सफलता से वहां के कोचिंग माफिया परेशान हो गए। उन्होंने आनंद पर मुफ्त में न पढ़ाने का दबाव डालना शुरू कर दिया। आनंद नहीं माने तो उनपर हमले किए गए, बम फेंके, गोलियां चलाईं और एक बार तो चाकू से हमला भी किया। लेकिन चाकू आनंद के शिष्य को लग गया। तीन महीने तक वह अस्पताल में रहा और इस दौरान सभी बच्चों ने उसकी खूब सेवा की और वह स्वस्थ हो गया।

आनंद कुमार के सुपर 30 को मिली अपार सफलता के बाद कई लोग सहयोग के लिए आगे आए। बड़े-बड़े उद्योगपतियों ने आनंद को मदद की पेशकश की। प्रधानमंत्री तक की ओर से आनंद को मदद की पेशकश की गई लेकिन आनंद कुमार ने सुपर 30 के संचालन के लिए किसी से भी आर्थिक मदद लेने से इंकार कर दिया। क्योंकि यह काम वे खुद बिना किसी की मदद से करना चाहते हैं। सुपर 30 का खर्च उनके कोचिंग सेंटर रामानुजम स्टडी सेंटर से चलता है।

आज आनंद राष्ट्रीय व अंतराष्ट्रीय मंचों को संबोधित करते हैं। उनके सुपर 30 की चर्चा विदेशों तक फैल चुकी हैं। कई विदेशी विद्वान उनका इंस्टीट्यूट देखने आते हैं और आनंद कुमार की कार्यशैली को समझने की कोशिश करते हैं।

आनंद मानते हैं कि उन्हें जो भी सफलता मिली उसका पूरा श्रेय उनके छात्रों को जाता है। छात्रों की मेहनत और लगन को जाता है। जबकि आईआईटी में हर साल पास होने वाले उनके सभी शिष्य अपनी सफलता का पूरा श्रेय अपने गुरू आनंद कुमार को देते हैं। सुपर 30 आनंद कुमार जैसे गुरू व शिष्यों की लगन और कठोर परिश्रम का नतीजा है। आनंद कुमार को कई पुरस्कारों से भी सम्मानित किया जा चुका है।

आनंद कुमार मानते हैं कि सफल होने के लिए प्रबल प्रयास, सकारात्मक सोच, कठोर परिश्रम और धैर्य की जरूरत होती है।

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