देहरादून: ‘गरुड़ पुराण’ के अध्याय 11 की श्लोक संख्या 11, 12, 13 और 14 में कहा गया है कि परिवार में किसी व्यक्ति की केवल कन्या है तो वह भी श्रद्धापूर्वक अपने पितरों का श्राद्ध कर सकती है। शास्त्र कहते हैं कि पुत्र के नहीं होने पर पत्नी अथवा पुत्री श्राद्ध कर सकती है। पुत्र की अनुपस्थिति में पुत्रवधू को भी श्राद्ध का अधिकार दिया गया है। महाराष्ट्र सहित कई उत्तरी राज्यो में अब पुत्र-पौत्र के नहीं होने पर पत्नी, बेटी, बहन या नातिन ने पितरों से संबंधित संस्कार करने आरंभ कर दिए हैं। काशी की संस्कृत वेद पाठशालाओं में तो कन्याओं को पांडित्य कर्म और वेद पाठन की ट्रेनिंग भी दी जा रही है।

इसमें महिलाओं को श्राद्ध करने-कराने का प्रशिक्षण भी शामिल है। ‘वाल्मीकि रामायण’ में एक प्रसंग आता है कि वनवास काल में पितृपक्ष के दौरान राम-लक्ष्मण व सीता पितृपक्ष के दौरान गया धाम पहुंचे। वहां श्राद्ध देने के लिए आवश्यक सामग्री जुटाने राम-लक्ष्मण नगर की ओर चल दिए, लेकिन दोपहर तक लौटे नहीं।

इधर, पिंडदान का समय निकला जा रहा था और सीता की व्यग्रता बढ़ती जा रही थी। इसी बीच दशरथ की आत्मा ने पिंडदान की मांग कर दी। ऐसे में फल्गू नदी के तट पर अकेली बैठी सीता असमंजस में पड़ गई। उन्होंने फल्गू नदी के साथ वटवृक्ष, केतकी के फूल और गाय को साक्षी मान बालू का पिंड बनाकर महाराज दशरथ के निमित्त पिंडदान कर दिया। थोड़ी देर में राम-लक्ष्मण लौटे तो सीता ने बताया कि उन्होंने समय निकल जाने के कारण स्वयं पिंडदान कर दिया है। पर, बिना सामग्री के पिंडदान कैसे हो सकता था, राम ने इसका प्रमाण मांगा।

तब सीता ने कहा कि फल्गू नदी की रेत, केतकी के फूल, गाय और वटवृक्ष इसके गवाह हैं। लेकिन, फल्गू नदी, गाय और केतकी के फूल इससे मुकर गए। सिर्फ वटवृक्ष ने ही सही बात कही। तब सीता ने दशरथ का ध्यान कर उनसे ही गवाही देने की प्रार्थना की। दशरथ ने सीता की प्रार्थना स्वीकार कर घोषणा की कि ऐन वक्त पर सीता ने ही मुझे पिंडदान दिया। इस पर राम आश्वस्त हुए, लेकिन तीनों गवाहों के झूठ बोलने पर सीता ने उन्हें श्राप दे दिया।

इसी कारण फल्गू नदी आज भी गया में सूखी रहती है और वहां सीताकुंड में पानी के अभाव में सिर्फ रेत से पिंडदान किया जाता है। गाय पूज्य होकर भी लोगों की जूठन खाती है और केतकी के फूल कभी पूजा में नहीं चढ़ाए जाते। वटवृक्ष को सीता ने लंबी आयु का आशीर्वाद दिया था। इसलिए वह आज भी दीघार्य एवं पूजनीय है।

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