कर्नाटक की पत्रकार गौरी लंकेश की जघन्य हत्या का मामला उसी तरह राष्ट्रीय स्तर पर उबाल का कारण बना है जैसा दो वर्ष पूर्व कन्नड़ लेखक एम.एम. कलबुर्गी की हत्या के समय बना था। भारत सदियों से विभिन्न विचारों, मत-मतांतरों का समाज रहा है। एक हिंदू धर्म में ही अनेक शाखाएं हैं और उनमें आपस का अंतर्विरोध है। विचारों से असहमति और मतभेद के साथ जीना एक स्वस्थ समाज का लक्षण है और भारत ऐसा ही समाज रहा है। इसलिए सहसा विश्वास नहीं होता कि वैचारिक विरोध के कारण कोई किसी की इस तरह निर्दयता से सरेआम हत्या कर दे। मगर एक वर्ग हमारे देश में ऐसा है, जिसने गौरी लंकेश की हत्या के साथ ही यह निष्कर्ष निकाल लिया कि यह तो उन्हीं लोगों का कारनामा है जिनके खिलाफ गौरी लिखती और बोलती थीं। गौरी लंकेश का साप्ताहिक कन्नड़ टेबलॉयड लंकेश पत्रिके भाजपा और संघ विरोधी तीखे लेखन के लिए जाना जाता है। जिस दिन उनकी हत्या हुई उसके पहले अपने अंतिम संपादकीय में फेक न्यूज के नाम से जो संपादकीय उन्होंने लिखा उसमें सभी फर्जी खबरों के लिए संघ और तथाकथित मोदी भक्तों को जिम्मेदार बताया गया। इसके लिए उन्होंने अनेक उदाहरण दिए जिनमें से कई निराधार भी थे।

गौरी लंकेश के लिखने और बोलने का तरीका जो भी रहा हो, उनके विचार जैसे भी रहे हों, विचार का विरोध विचार से होना चाहिए, हिंसा से नहीं। हत्या से बड़ा जघन्य पाप तो कुछ हो ही नहीं सकता। मगर सवाल तो यही है कि क्या वाकई गौरी लंकेश की हत्या उनके वैचारिक विरोधियों ने किया है। ये विरोधी वही हैं जिनके खिलाफ उन्होंने सबसे ज्यादा लिखा और बोला है। वह लगातार सोशल मीडिया पर सक्रिय थीं। कहा जा रहा है कि कभी उन्होंने किसी प्रकार की धमकी मिलने की बात नहीं की। कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया, जो उन्हें एवं उनके परिवार को अच्छी तरह जानते थे, ने भी कहा है कि कुछ ही दिनों पहले गौरी लंकेश उनसे मिली थीं, लेकिन उन्होंने किसी खतरे की बात नहीं की थी। बेंगलुरु पुलिस में भी उन्होंने जान को खतरा होने की कभी शिकायत नहीं की थी। सिद्धारमैया सरकार के मुखिया हैं और प्रदेश में कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी उनकी है। हो सकता है अपने बचाव के लिए उन्होंने यह बयान दे दिया हो ताकि उनसे कोई यह न पूछे कि सरकार ने गौरी की सुरक्षा के लिए व्यवस्था क्यों नहीं की।

देश में एक विचित्र स्थिति है। अभी मुख्यमंत्री ने विशेष जांच दल यानी एसआइटी का गठन किया है जिसने न तो कोई बयान दिया है और न हत्यारों के संबंध में कोई संकेत। इसके बावजूद कुछ नेताओं, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को पता चल गया कि उनकी हत्या तो हिंदुत्ववादी शक्तियों ने किया है। हिंदुत्ववादी शक्तियों में भी इनका इशारा भाजपा एवं राष्ट्रीय स्वयं संघ से ही होता है। यही बात एम.एम. कलबुर्गी की हत्या में कही गई। खूब धरना प्रदर्शन हुए। आज दो वर्ष हो गए। कर्नाटक की पुलिस यह पता लगाने में असमर्थ है कि कलबुर्गी की हत्या किसने की। पुणो और कोल्हापुर में नरेंद्र दाभोलकर एवं गोविंद पनसारे की हत्या हुई। उसे भी हिंदुत्ववादी शक्तियों का अपराध बता दिया गया। दाभोलकर की हत्या की जांच सीबीआइ कर रही है, लेकिन वह भी किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुंंची है। यही हालत पनसारे की हत्या के संदर्भ में है। अभी तक इनमें से किसी हत्या में किसी व्यक्ति या संगठन का हाथ जांच एजेंसियों को दिखा नहीं है, लेकिन विरोधियों को दिख गया। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने तो अपने बयान में कह दिया है कि जो भी भाजपा या संघ के विचार का विरोध करता है उस पर दबाव बनाया जाता है, उसे पीटा जाता है, उस पर हमला किया जाता है और उसे मार भी दिया जाता है। माकपा के महासचिव सीताराम येचुरी ने भी इसे संघ परिवार की सुनियोजित हिंसा कहा है।

यह दोनों लोग देश के बड़े नेता हैं। इनसे पूछा जाना चाहिए कि आपने जो आरोप लगाए हैं उनके प्रमाण आपके पास हैं क्या? जाहिर है, इनके पास कोई प्रमाण नहीं हैं। संघ परिवार के विचार से असहमत होना अस्वाभाविक नहीं है। उसके आप घोर विरोधी भी हो सकते हैं। किंतु निष्पक्षता से विचार करने पर यह बात गले नहीं उतरती कि 92 साल से सक्रिय कोई संगठन अपने विरोध में लिखने और बोलने वाले की हत्या करे। जैसा गौरी लंकेश लिखतीं थीं वैसा दूसरे लोग भी लिखते और बोलते हैं। तब तो भारत में न जाने कितने पत्रकारों और लेखकों की हत्या हो जाएगी। संघ और भाजपा के खिलाफ लिखने और बोलने वालों की छोटी संख्या तो है नहीं। आज तक संघ का कोई कार्यकर्ता संगठन के खिलाफ लिखने और बोलने वालों के खिलाफ हत्या करने के अपराध में पकड़ा नहीं गया। इसलिए इस तरह का आरोप केवल राजनीति है और यह दुर्भाग्यपूर्ण है। सच कहा जाए तो इससे जांच एजेंसियों पर भी दबाव पड़ता है। राहुल गांधी जैसे नेता कोई बात बोल दें और प्रदेश में उनकी सरकार है तो क्या जांच पर इसका असर नहीं होगा? आज यह स्वीकारने में कोई आपत्ति नहीं है कि चाहे दाभोलकर हों, पंसारे या कलबुर्गी उनके हत्यारे संभवत: इसीलिए नहीं पकड़े जा सके, क्योंकि जांच की एक दिशा नेताओं, पत्रकारों और समाजिक कार्यकर्ताओं के दबाव में निर्धारित हो गई।

गौरी लंकेश के भाई इंद्रजीत लंकेश ने साफ कहा है कि उन्हें बेंगलुरु पुलिस पर भरोसा नहीं है। उन्होंने कलबुर्गी हत्याकांड की मौजूदा स्थिति की चर्चा करते हुए कहा कि आज उनका परिवार निराश होकर सीबीआइ जांच की मांग कर रहा है। इसलिए हमारी भी मांग है कि हत्या की जांच सीबीआइ करे। परिवार ने किसी संगठन या विचार पर आरोप नहीं लगाया है। राहुल गांधी को अपने पार्टी के मुख्यमंत्री से पूछना चाहिए कि उनके राज्य में ऐसा क्यों हुआ? यह काम उन्होंने कलबुर्गी की हत्या के समय भी नहीं किया। हत्या आपकी सरकार के अंदर हो और आरोप आप भाजपा और संघ पर लगाए। दाभोलकर की हत्या भी तो महाराष्ट्र में कांग्रेस शासनकाल के दौरान ही हुई। आश्चर्य की बात है कि गौरी लंकेश की हत्या पर आसमान उठाने वाला कोई नेता इस पहलू को नहीं उठा रहा। क्यों? गौरी लंकेश ने कांग्रेस नेता डी. शिवकुमार के कथित भ्रष्टाचार के बारे में बहुत लिखा था। ये वही शिवकुमार हैं जिन्होंने गुजरात के कांग्रेस विधायकों की मेजबानी की थी और जिनके यहां छापा पड़ा था। वह भी तो उनके खिलाफ हो सकते हैं। अगर कोई इन पहलुओं को नहीं उठा रहा है तो इसे किसी की हत्या पर गंदी राजनीति नहीं तो और क्या कहेंगे?

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