मेरे एक मित्र हैं, शुक्ला जी। बेहद उग्र एवं कर्कश स्वभाव वाले। शायद इसी वजह से कई मित्र उन्हें ‘कागराज’ यानी कौए की उपमा से अलंकृत कर चुके हैं। इस बार कई दिनों बाद शुक्ला जी से मुलाकात हुई तो लगे हाथों मैंने उन्हें घर आने का निमंत्रण दे दिया। वो मेरी बात भला कैसे टालते, सो एक दिन घर आ धमके। इधर-उधर की बातें हो रही थी कि इसी बीच कोई बात उन्हें लग गई और वे उग्र हो उठे। भूलवश मैंने भी अपना स्वर थोड़ा ऊंचा कर दिया। बस! फिर क्या था, कमरा शुक्ला जी की कर्कश वाणी से गूंजने लगा।

इसी बीच एक और गलती करते हुए मैं बोल पड़ा कि आपको लोग ‘कागराज’ ठीक ही कहते हैं। यह सुनते ही शुक्ला जी का चेहरा तमतमा उठा, लगा मानो मैंने सांप की पूंछ पर पांव रख दिया हो। हैरत की बात यह थी कि शुक्ला जी खुद को कौए की उपमा दिए जाने से ज्यादा व्यथित कौए के प्रति हमारी सोच और मानसिकता को लेकर थे। इसके बाद उन्होंने कौए और उसके प्रति हमारी सोच को लेकर इतने कटु सवाल दागे कि मैं कई दिनों तक अपनी जिह्वा को कोसता रहा।

शुक्ला जी का पहला सवाल यह था कि क्या तुम भी अन्य लोगों की तरह कौए को धूर्त, चालाक और अपशकुनी समझते हो। मैं इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए अपना शब्दकोश खंगाल ही रहा था कि शुक्ला जी ने दूसरा सवाल दागा, निश्चित रूप से तुम भी कौए को अपने पुरखों का प्रतीक मानते होगे और पितृपक्ष में कौओं की आवभगत भी करते होगे।

‘मुझे काटो तो खून नहीं, क्योंकि शुक्ला जी के दोनों सवालों का जवाब ‘हां’ में ही था और उनके इन सवालों का निहितार्थ भी मैं भलीभांति समझ गया था। सच भी है, अगर कौआ धूर्त, चालाक और अपशकुनी है तो हमारे पुरखों का प्रतिनिधि कैसे हो सकता है। मैं ही क्या, कोई भी अपने पितरों के बारे में ऐसी अवधारणा जेहन में नहीं ला सकता।

हालांकि, मेरा जवाब सुने बगैर ही शुक्ला जी ने तीसरा सवाल कर डाला। बोले, हम अपने बच्चों को एक लोकोक्ति ‘काक चेष्टा, वकोध्यानम्, श्वान निद्रा तथैव च, अल्पाहारी, गृह त्यागी विद्यार्थी पंच लक्षणम्’ सुनाकर कौए की तरह चेष्टा (प्रयासरत) रखने की सीख देते हैं। आखिर क्यों? कौआ तो धूर्त, चालाक और अपशकुनी है ना। मेरे पास खामोश रहने के सिवा कोई चारा न था। असल में हम ऋषियों की वाणी को भूलकर कौए के सद्गुण न पहचान सके।

हमने उसे आलसी समझकर ‘कौए और गिलहरी’ की मनगढ़ंत कहानी रच ली, जबकि कौए ने पानी में कंकड़ डालकर पानी पिया और अपनी चतुराई सिद्ध करने का प्रयास किया। लेकिन, हमें यह नजर नहीं आया और हमने कौए के साथ भेदभाव जारी रखा।

सच कहें तो कौआ निहायत सामाजिक प्राणी है। जिस दिन किसी कौए की मृत्यु होती है, उस दिन उसका कोई साथी भोजन नहीं करता। कौआ किसी साथी के साथ मिल-बांटकर ही भोजन ग्रहण करता है। मेहनतकश और दूरदर्शी कौआ लगातार मीलों तक उड़ सकता है। उसे भविष्य में घटने वाली घटनाओं का भी पहले ही आभास हो जाता है। शायद इसीलिए कौए को पितरों का प्रतिनिधि कहा गया और पितृपक्ष में पितरों के नाम अन्न का सबसे पहला कौर उसी को दिया जाता है।

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