क्या तुमने कभी सूरज की किरणों को अलसाते हुये देखा है,
देखा है कभी वारिश के मेघों को थकियाते हुये,
चंद्रमा की शीतलता को देखा है कभी तपते हुये ,
अनगिनत, असन्ख्य बोझ संभाल रही है ये धरा,
न घूमे धरा अपनी धुरी पर, क्या एक क्षण ऐसा हुआ है कभी,
पृकृति मे, न कुछ थकता है और न ही रूकता,
फिर ऐ इंसा, तू क्यों थक जाता है रोज घर आते हुये,
क्यों होता है मन उदास परिवार से बतियाते हुये,
क्या तू नही जी सकता हर पल खुशहाली मे,
खुशियाँ बांटते हुये, खिलखिलाते – ठहाके लागते हुये
ले प्रेरणा तू पृकृति से, और चलता रह – चलता रह – चलता ही रह, बिना थके, बिना रूके, सदा के लिये.

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