कहते है त्रेतायुग में जय लंकेश कहकर रावण की सेना वानर सेना पर टूट पड़ती थी, आजकल गौरी लंकेश कहकर नेता एक दुसरे पर टूट रहे है हालाँकि गौरी की हत्या शर्मनाक है और करने वाले धर्म और कर्म से बेहद कमजोर और भयभीत रहे होंगे वरना साहसी इन्सान कभी किसी पर पहले हमला नहीं करता, गौरी पर बहुत कुछ लिखा गया सोचा मैं भी संवेदना के शब्दों दो पुष्प अर्पित कर दूँ
तमिलनाडु के अरियलूर जिले में 17 साल की लड़की एस. अनीता की आत्महत्या ने राजनीतिक शक्ल लेना शुरू ही किया था कि कन्नड़ भाषा की “लंकेश पत्रिका” की सम्पादक और लेखक गौरी लंकेश की हत्या ने उसे भुला दिया। नेताओं को अनीता की जाति टटोलनी पड़ती इस कारण बिना मेहनत के ही जानी पहचानी गौरी लंकेश को ही मुद्दा बनाना उचित समझा, मुझे पहली बार जानकर आश्चर्य हुआ कि पत्रकार भी पार्टी, धर्म, मजहब और जातियों में बंधे होते हैं। जहाँ पूरे देश के बुद्धिजीवियों को गौरी की हत्या ने हिलाया वहीं मुझे इस खबर ने हिला दिया कि बीजेपी विरोधी लेखक गौरी लंकेश की हत्या!
ऐसा नहीं है कि मेरे अन्दर गौरी के लिए कोई सहानुभूति या संवेदना नहीं है, मानवता के नाते मुझे भी दुःख हुआ लेकिन मेरा दुःख उस समय अनाथ सा हो गया जब मैंने प्रेस क्लब में वह पत्रकार और नेता देखे जो सिर्फ अखलाक, पहलु खान और याकूब मेनन की मौत पर मातम मनाते दिखे थे। गौरी लिख रही थी! मुसलमानों की ओर से, भारत से भी खदेड़े जा रहे बर्मा के रोहिंग्या मुसलमानों की ओर से, नक्सलवादियों की ओर से और कश्मीर की आजादी के दीवानों की तरफ से।
गौरी की मौत पर दिल्ली के बड़े शिक्षण संस्थान जेएनयू में शोक सभा आयोजित की गयी उसी जेएनयू में जहाँ सेना के जवानों की शाहदत का जश्न मनाने की पिछले दिनों खबर सबने सुनी थी। गौरी कन्हैया को अपना बेटा मानती थी। उमर खालिद का हाल पूछती थी। वह कर्नाटक की राजनीति में अपनी पत्रिका से एक अलख जगाना चाह रही थी। मुझे नहीं पता उसकी मौत किसके काम आएगी शायद उनके ही काम आये जिनके काम दाभोलकर, गोविन्द पानसरे, एमएम कलबुर्गी, अकलाख, इशरत जहाँ की आई थी।
ऐसा नहीं है देश में ये सिर्फ तीन या चार पत्रकार या लेखक मारे गये। नहीं, अकेले बिहार ही में हिन्दी दैनिक के पत्रकार ब्रजकिशोर ब्रजेश की बदमाशों ने गोली मार कर हत्या कर दी। इससे पूर्व भी सीवान में दैनिक हिन्दुस्तान के पत्रकार राजदेव रंजन और सासाराम में धर्मेंद्र सिंह की हत्या की जा चुकी है। पिछली सरकार में उत्तर प्रदेश में एक पत्रकार को कथित रूप से जलाकर मार डालने के आरोप में पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री के खिलाफ मामला दर्ज हुआ था। कहा जाता है कि कथित रूप से फेसबुक पर मंत्री के खिलाफ लिखने के कारण पत्रकार जगेंद्र सिंह को जान गवानी पड़ी थी। लेकिन इन सबका दुर्भाग्य रहा कि इनके लिए प्रेस क्लब में कोई शोक सभा आयोजित नहीं की गयी और न ही राजकीय सम्मान के साथ इनक गौरी की तरह अन्तिम संस्कार। ‘‘वर्ष 1992 के बाद से भारत में 27 ऐसे मामले दर्ज हुए हैं जब पत्रकारों का उनके काम के सिलसिले में कत्ल किया गया। लेकिन किसी एक भी मामले में आरोपियों को सजा नहीं हो सकी है।’’
आज गौरी के अज्ञात हत्यारों का धर्म राजनेताओं को पहले ही पता चल गया। कहा जा रहा है कि गौरी हिन्दुओं के विरोध में लिखती थी तो उसकी हत्या हिन्दुओं ने ही की है। दुःख का विषय है नबी के कार्टून बनाने के आरोप में फ्रांस में मारे गये शार्ली हाब्दो के दर्जनों पत्रकारों को मारने वालों का मजहब अभी तक पता नहीं चला, हम जिसे स्वास्थ्य पत्रकारिता समझ रहे हैं, वह दरअसल एक मजहबी सूजन का शिकार जिस्म है।
मैंने सुना था दुःख सुख सबका साझा होता है लेकिन भारत में ऐसा नहीं है जब पत्रकार राजनितिक दलों से, लेखक मजहबों से, कानून संवेदना से और नेता वोटों के लालच में बंधे हों तो वहां आम इन्सान को सुख-दुःख भी बंटा सा नजर आता है। जहाँ गौरी के हत्यारों को पकड़ने और सजा देने की मांग होनी थी वहां इस मुद्दे से ध्यान भटककर दूसरा राजनेतिक स्वांग रचा जा रहा बात होनी चाहिए कलम की सुरक्षा की वहां बात कुर्सी की रक्षा की हो रही है ऐसे तो ना मौत रुकेगी ना राजनीति!!

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