मोदी का न्यू इंडिया, मोदी की न्यू बीजेपी फिर पुरानी बीजेपी का क्या होगा? और क्या होगा संघ एवं संघ की विचारधारा का? संघ को शायद यह सोचना होगा। पीएम मोदी म्यांमार में आखिरी मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर की मजार पर गए। आपको याद होगा कि कभी लालकृष्ण आडवाणी पाकिस्तान में जिन्ना की मजार पर गए थे और संघ को इतना बुरा लगा था कि संघ आडवाणी के पीछे पड़ गया। इस कदर पीछे पड़ गया कि आज वे मूक-दर्शक बना दिए गए हैं। बस, कहने के लिए वे मार्ग-दर्शक हैं, मार्ग-दर्शक तो बीजेपी का संघ है। सवाल है कि क्या संघ मोदी का भी मार्ग-दर्शक है। अगर ऐसा होता तो क्या मोदी आखिरी मुगल बादशाह की मजार पर श्रद्धांजलि देने जाते? लगता है, संघ और मोदी की विचारधारा में फर्क है। यह फर्क हो भी सकता है या फर्क दिखाने की कोशिश।
संघ का जन्म 1925 में हुआ था और भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम 1857 के नायक थे बहादुरशाह जफर। हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक और हिंदू-मुस्लिम सद्भावना के सफल प्रयोग के महान नेता। सांप्रदायिकता को नकारनेवाले बड़े नेता के रूप में हम बहादुरशाह जफर को याद करते हैं क्योंकि 1857 प्रथम स्वाधीनता संग्राम में हिंदू-मुस्लिम एकता का जोरदार प्रदर्शन हुआ था और यह हमें याद रखना चाहिए। साथ ही, हमें यह भी याद रखना चाहिए कि हम मुस्लिम लीग, हिंदू महासभा और संघ को किस रूप में याद करते हैं। किनकी प्रेरणा से इन सांप्रदायिक संगठनों का जन्म हुआ था?

आपको याद होगा कि लॉर्ड कर्जन ने 1905 में बंगाल का विभाजन सांप्रदायिक आधार पर किया था, वह भी इसलिए कि अंग्रेज 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के हिंदू-मुस्लिम एकता से बेइंतहा घबराए हुए थे। 1857 में अंग्रेजों को अहसास हो चुका था कि अगर भारत में हिंदू-मुस्लिम एकता कायम रही तो अंग्रेजों का तंबू उखड़ने में देर न लगेगी इसलिए अंग्रेजों ने हिंदू-मुस्लिम एकता को छिन्न-भिन्न करने के लिए एक व्यापक और संगठित प्लान बनाया और उसका जिम्मा लार्ड कर्जन को सौंपा गया। लॉर्ड कर्जन ने इस अफसाने को बखूबी अंजाम तक पहुंचाया और मुस्लिम बहुल पूर्वी बंगाल एवं हिन्दू बहुल पश्चिमी बंगाल का गठन कर दिया।
आपको याद दिला दें कि 1905 में फ्रांस ने कानून बनाकर यह ऐलान कर दिया कि राजकाज में पोप की जरूरत नहीं। वहीं, 1905 में अंग्रेजों ने भारत में धर्म और सांप्रदायिकता के आधार पर बंगाल का विभाजन किया और अपने उपनिवेश में मुस्लिम कट्टरपंथी तथा हिंदू कट्टरपंथी को हिंदुस्तानी पोप के रूप में भारतीय राजनीति में खड़ा किया। इसका बड़ा विरोध भी हुआ था। इस विभाजन से विश्व कवि रवींद्रनाथ ठाकुर बड़ा आहत हुए और उन्होंने लिखा ‘आमार सोनार बांग्ला, आमि तुमाके भालो वाशी।’ यही गीत आगे चलकर बांग्ला देश का राष्ट्रगान बना। आपको याद दिला दें कि 1905 में बंगाल का लॉर्ड कर्जन ने न सिर्फ सांप्रदायिक आधार पर विभाजन किया बल्कि सांप्रदायिक संगठनों को बनाने की भी प्रेरणा देना शुरू कर दिया और उनका लालन-पालन भी करने लगा। ब्रिटिश उपनिवेशवाद के गर्भ में इनका पोषण हुआ। उसी वर्ष ढाका में बंगाल के नबाव को प्रेरित करके अंग्रेजों ने मुस्लिम लीग बनवाया और मुस्लिम राष्ट्र की सोच की बुनियाद रखी। इसी की देखा-देखी 1915 में हिंदू महासभा की स्थापना हुई और 1925 में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ बना। यह काल सांप्रदायिक विद्वेष का काल कहलाता है।

अंग्रेजों का मकसद था कि इन सांप्रदायिक संगठनों के जरिए राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम के आंदोलन को कमजोर किया जाए। महात्मा गांधी के नेतृत्व में राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम का आंदोलन परवान चढ़ रहा था और बापू हिंदू-मुस्लिम एकता के पक्के हिमायती थे। वे बहादुरशाह जफर की परंपरा को आगे बढ़ा रहे थे। उनके रास्ते में अंग्रेजों की प्रेरणा से सांप्रदायिक संगठन रोड़े अटकाने का काम कर रहे थे। धर्म और संप्रदाय के नाम पर राष्ट्र बनाने की अवधारणा को हवा दी जा रही थी। यही आगे चलकर इतना वीभत्स रूप ले लिया कि बापू की हत्या करने में भी सांप्रदायिक विचारधारा के लोगों को कोई गुरेज न रहा। हिंदू-मुस्लिम एकता के हिमायतियों पर आज भी हमले हो रहे हैं। तर्कवादी दामोलकर और प्रफेसर कलबुर्गी, पानसरे और गौरी लंकेश आदि अनेक नाम और उदाहरण सामने हैं।
पीएम मोदी महात्मा गांधी से लेकर बहादुरशाह जफर तक को श्रद्धांजलि देने में गर्व महसूस करते हैं और ये संदेश देते हैं कि वे संघ से निकले जरूर हैं मगर वे संघ की संकीर्णता में सिमट कर रहनेवाले नेता नहीं हैं। यह देश गांधी का देश है, गॉडसे का नहीं, यह देश बहादुरशाह जफर का भी देश है। क्या ये नजरिया संघ अपनाएगा? क्या इस नजरिए को बीजेपी अपनाएगी? अगर ऐसा होगा, तब न्यू इंडिया और ओल्ड इंडिया के बीच एक नया और मजबूत सेतु बनेगा। फिर देश में नफरत की राजनीति नहीं होगी और भेदभाव के लिए कोई जगह नहीं बचेगी। तब कविवर नीरज की इन पंक्तियां सार्थक होंगी
‘चाहे जेठ बरसाए अंगारे, या पतझर हर फूल उतारे
अगर हवा में प्यार घुला है, हर मौसम सुख का मौसम है’

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