पढ़ने-लिखने, नौकरी करने और बसने के लिए किस देश में जाना ठीक रहेगा? इस सवाल का जवाब एक्सपैट इनसाइडर सर्वे-2017 में खोजने की कोशिश की गई है। जवाब सुनकर शायद आप चौंक जाएं। अरब मुल्क बहरीन इन मामलों में टॉप पर है। उसके बाद अमेरिका के पास पड़ने वाले छोटे से द्वीपीय देश कोस्टारिका का नंबर है। इस सर्वे में 166 देशों के उन 13,000 लोगों ने हिस्सा लिया, जो विदेशों में रहते हैं। ऐसे ही लोगों के एक नेटवर्क ‘इंटरनेशंस’ द्वारा यह सर्वे हर साल किया जाता है। इसका मकसद दूसरे देशों में रह रहे अधिकारियों, कुशल श्रमिकों, विद्यार्थियों और सेवानिवृत्त लोगों की राय प्रस्तुत करना है।

बहरीन जैसे छोटे मुल्क ने पर्यटकों पर विशेष ध्यान दिया है। सर्विस सेक्टर को भी उसने बेहतर बनाया है। वहां रह रहे विदेशियों का कहना है कि वे स्थानीय भाषा बोले बगैर भी वहां की संस्कृति में घुल-मिल गए। लेकिन इस सर्वे की खास बात यह है कि कई विकसित, शक्तिशाली देश काफी पीछे नजर आ रहे हैं। वहां रह रहे विदेशी इन्हें पहले की तरह पसंद नहीं करते। अमेरिका 65 देशों की सूची में पांच स्थान नीचे गिरकर 43वें पर पहुंच गया है, जबकि ब्रिटेन 21 स्थान नीचे गिरकर 54वें पर आ गया है।

अमेरिका में राष्ट्रपति के पद पर डॉनल्ड ट्रंप के आने का असर पड़ा है, वहीं ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से बाहर आने के फैसले ने विदेशियों पर असर डाला है। उनका मानना है कि अमेरिका में स्वास्थ्य सेवाएं काफी महंगी हो गई हैं और इंग्लैंड में मकानों के रेट बढ़ गए हैं। जहां तक भारत का प्रश्न हैं, तो हम आठ स्थान नीचे गिरे हैं और 49वें से 57वें स्थान पर चले आए हैं। भारत में रह रहे विदेशियों का मानना है कि यहां उनके बच्चों की शिक्षा के लिए बहुत कम विकल्प हैं। फिर एजुकेशन महंगा भी है। लेकिन महिलाओं का कहना है कि वे असुरक्षा की वजह से भारत में सहज महसूस नहीं करतीं। सर्वे में शामिल 80 फीसदी लोगों ने कहा कि भारत में प्रदूषण बहुत ज्यादा है।

दिलचस्प बात यह है कि सर्वे में काम करने के मामले में चीन को बहुत अच्छा स्थान बताया गया है। वहां रहने वाले विदेशी अपने करियर से बेहद संतुष्ट हैं, लेकिन वे अपने जीवन स्तर को लेकर उतने खुश नहीं हैं। इसीलिए चीन की रैंक 55 है। वहां रहने वाले विदेशी प्रदूषण से परेशान हैं, साथ ही उन्हें शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की क्वॉलिटी और खर्च भी अपने अनुकूल नहीं लगता। इस सर्वे का छुपा हुआ निष्कर्ष यह है कि जहां भी सामाजिक-राजनीतिक उथल-पुथल ज्यादा है, वहां विदेशी खुश नहीं हैं। इससे तरक्की की एक कसौटी मिलती है कि सेवाओं का स्तर सुधरे और समाज में शांति व सौहार्द हो। अगर यह नहीं है तो प्रगति अधूरी है।

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