एक माँ के लिए दुनिया दिन पर दिन डरावनी होती जा रही है, बहुत ही डरावनी। मुझे कभी ब्लू वेल का खेल डराता है, कभी रात दिन आने वाली बच्चों के यौन शोषण की वारदातें। स्कूल जाने वाले बच्चों की बसों के ऐक्सीडेंट और हर दूसरी या तीसरी खबर।

मेरी माँ कहती थी जो दिन बीत गया, बस वो दिन अच्छा था। सही कहती थी वह, दिन बीतते ही बच्चों को देख के दो पल की शांति मिलती है, और बस ये दो पल ही रहती है। पिछली बार मैं बच्चों को लेकर कई दिन तक रोती रही थी, जब पाकिस्तान के पेशावर के एक स्कूल में मासूम बच्चों को आतंकवादियों ने गोलियों से भून डाला था। कई दिनों तक मैं अपने बच्चों को अपने आप से एक मिनट के लिए भी दूर नहीं कर पाती थी। फिर किसी तरह हिम्मत बटोरी, सब ठीक होने लगा, सच कहूं तो बस बाहर से दिखने लगा। मेरे अंदर से अपने बच्चों के लिए डर कभी गया ही नहीं।

माँ शायद ऐसी ही होती है। इसीलिए बच्चों को घर आने में पांच मिनट भी देर हो जाए तो माँ को बेचैनी शुरू हो जाती है। अगर और भी ज़्यादा देर हो और गलती बच्चे की हो तो माँ उसे डांट भी लगा देती है। पर ऐसा करते हुए कहीं न कहीं अपने को समझा रही होती है, और मन ही मन चैन की सांस लेती है कि चलो उसका बच्चा सलामत है।

ये डर, ये बेचैनी अब हर दिन बड़ी होती जा रही है, और ज़्यादा डरावनी और ज़्यादा भयानक क्योंकि प्रद्युम्न की माँ पिछली रात तो सुकून में ही रही होगी। वह तब तक सुकून में ही रही होगी जब बच्चा स्कूल चला गया और फिर बिलकुल बेफिक्र हो गयी, जब उसका लाड़ला अपने स्कूल पंहुच गया होगा। सोचा होगा चलो जब तक वह आएगा तब तक उसके लिए खाना बना दूं, उसके कपडे धो दूं, किताबें संभाल दूं… और भी न जाने क्या-क्या…

बच्चे माँ के दिमाग और दिल में होते हैं। उनका रात-दिन, चूल्हा-चौका, ऑफिस–ऑफिस टूर, मीटिंग सब चलती हैं पर एक कम्पार्टमेंट सिर्फ बच्चों का होता है। प्रद्युम्न की माँ के दिल का वह हिस्सा चला गया, पर अब भी दिल और दिमाग में सब कुछ रहेगा। जिस दिन वह बच्चे की पसंद का खाना बनाएगी, वह रोयेगी। आंसू सूख जाएंगे पर वह हर दिन, हर रात बस रोयेगी। वह जब शांत होगी तो भी रो रही होगी। उसके जन्मदिन पर, उसके बराबर के बच्चों को देखके, हर दिन ये सोच के की आज मेरा बेटा ज़िंदा होता तो इतना बड़ा होता। आज वह ये करता, वह ये नहीं करता, वह इस बात पर हंसता, वह इस बात पर रोता।
बच्चे के साथ एक माँ का जन्म होता है, अपने बच्चे के जाने के बाद भी मां मरती नहीं है, वह अपने बच्चे को मरने नहीं देती। याद बन के, लेकिन ये याद बहुत दर्द भरी याद है। ऐसा दर्द जिसका कोई इलाज नहीं है, कहीं नहीं।

जो प्रद्युम्न की माँ का दर्द है, वह अब हम सब का डर है। हर मां का, हर पिता का डर है। हर कोई आज बेबस है, हर कोई एक ही सवाल पूछ रहा है, आज प्रद्युम्न है, कल अगर कोई दूसरा हो गया तो? क्या हमारे बच्चे स्कूलों की चारदीवारी में भी सुरक्षित नहीं हैं? क्या हम अब अपने बच्चों को घर में बंद कर लें। ‘होमस्कूलिंग’ शुरू कर दें? पर क्या इसके बाद सब ठीक हो जाएगा? बच्चों को ‘गुड टच बैड टच’ सिखाने से क्या होगा, अगर सामने कोई चाकू लेकर खड़ा है। सात साल के बच्चे को ‘न’ कहके चिल्लाना सिखा के क्या हो जाएगा? क्या सात साल का बच्चा इतनी ‘मार्शल आर्ट’ सीख लेगा की चाकू और बन्दूक लिए हुए लोगों से मुकाबला कर लेगा? बचा लेगा खुद को? हम किसे धोखा दे रहे हैं?

माफ़ कीजिये ये सिर्फ यौन शोषण का मामला नहीं है। स्कूल में चाकू कैसे आया? बच्चे के वॉशरूम में बाहरी इंसान कैसे पंहुचा? अगर ये कंडक्टर चाकू लेकर वॉशरूम में जाता है तो इसका मतलब वह बस में भी चाकू लेकर घूमता होगा? ये बात कोई क्यों नहीं पूछ रहा? यानी बच्चे एक चाकू वाले कंडक्टर के साथ बस में जाते थे? या फिर पूरी बात ही कुछ और है? कौन तय करेगा कि बाकी बच्चे स्कूल में सुरक्षित हैं? या अभी तक थे?

एक सात साल का बच्चा एक जाने माने पॉश स्कूल के अंदर सरेआम मार दिया जाता है, किसकी ज़िम्मेदारी है? क्या स्कूल प्रबंधन सिर्फ मोटी फीस लेने के लिए है? क्या प्रिंसिपल सिर्फ माँ-बाप को साल में दो बार शक्ल दिखा के ज्ञान देने के लिए है? स्कूल के सामने माँ-बाप अपने आप को कितना बेबस पाते हैं, जब स्कूल प्रबंधन अपनी ज़िम्मेदारियों से हाथ झाड़ लेता है। तो क्या हम अपनी ज़िम्मेदारी पर अपने बच्चों को स्कूल भेज रहे हैं? हमें मंहगी शिक्षा के नाम पर सिर्फ बेवकूफ बनाया जा रहा है?

जो स्कूल माँ-बाप को डरा रहा है तो वह बच्चों का क्या हाल कर रहा होगा? कभी-कभी लगता है कि और कोई नहीं हम खुद दोषी हैं, अपने बच्चों को इस दुनिया में लाने के, जिनके लिए हवा साफ़ नहीं, खेलने के लिए मैदान नहीं, भरोसा करने के लिए लोग नहीं। एक इलेक्ट्रॉनिक दुनिया है, जहां ब्लू वेल उन्हें निगलने को बैठी है। कहाँ लेकर जाएं अपने बच्चों को? फिलहाल तो दूर-दूर तक सिर्फ भयानक और डरावना अंधेरा है। किसी को उजाला दिखे तो मुझे भी बताना।

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