यह खबर निराशाजनक है कि वित्त मंत्रालय ने आईआईटी संस्थानों की स्थिति सुधारने और उनकी वैश्विक साख मजबूत करने के मकसद से उन्हें 8700 करोड़ रुपये आवंटित करने की योजना नामंजूर कर दी। मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा प्रस्तावित इस विश्वजीत प्रॉजेक्ट के माध्यम से सभी पुराने आईआईटी संस्थानों को पांच साल की अवधि में 1250 करोड़ रुपये मिलने थे जिनका इस्तेमाल उन्हें इन्फ्रास्ट्रक्चर सुधारने, विदेशों से फैकल्टी मेंबर हायर करने और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों से तालमेल बढ़ाने में करना था। इस प्रॉजेक्ट का ठुकराया जाना इन प्रीमियर संस्थानों के पुनरुद्धार कार्यक्रम के लिए बड़ा झटका है।

बीते हफ्ते ही जारी हुई इस साल की वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग के टॉप 200 में एक भी भारतीय संस्थान शामिल नहीं है। देश का फ्लैगशिप वैज्ञानिक संस्थान समझा जाने वाला इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस जो पिछले साल 201 से 250 वाले ग्रुप में था, इस बार नीचे खिसक कर 251 से 300 वाली कैटिगरी में आ गया है। आईआईटी दिल्ली पिछले साल 351-400 वाले समूह में था, मगर इस साल वह 451-500 वाली कैटिगरी में चला आया। आईआईटी मुंबई ने जैसे-तैसे अपनी पुरानी पोजिशन बरकरार रखी, लेकिन आईआईटी कानपुर नीचे आ गया। बावजूद इसके, सरकार आईआईटी संस्थानों के लिए जेब ढीली करने को तैयार नहीं है। वित्त मंत्रालय का तर्क भी दिलचस्प है।

मीडिया में आ रही सूचनाओं के मुताबिक प्रॉजेक्ट को सैद्धांतिक मंजूरी देने संबंधी मानव संसाधन विकास मंत्रालय का निवेदन वापस लौटाते हुए वित्त मंत्रालय ने कहा कि आईआईटी संस्थानों को पहले बुनियादी मुद्दों को संबोधित करना चाहिए। बुनियादी मुद्दे, यानी फीस तय करने की स्वायत्तता हासिल करना और कॉरपोरेट हाउसों के सौजन्य से फंड जुटाना। अपने आप में यह कोई बुरी बात नहीं है। देश के प्रीमियर शिक्षा संस्थानों को वित्तीय स्वायत्तता हासिल करने की कोशिश करनी ही चाहिए। प्राइवेट सेक्टर से अपने स्तर पर

मदद लेने का सुझाव भी गलत नहीं है। इससे जहां ज्ञान के सृजन में इंडस्ट्री की एक स्पष्ट भूमिका बनेगी, वहीं ज्ञान को उपयोगी स्वरूप देने में सहायता भी मिलेगी। हां, यह जरूर ध्यान में रखना होगा कि बिकने वाले ज्ञान के चक्कर में हम न बिकने वाले ज्ञान को भूल न जाएं, या उसे अनुपयोगी न मान बैठें। मगर इन सुझावों की उपयोगिता स्वीकार करते
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भई, वित्त मंत्रालय के पास तो किसी जरूरी काम के लिए पैसा नहीं है, चाहें फिर बात रेलवे की सुरक्षा के लिए फंड की हो, सामाजिक सुरक्षा की योजनाओं के लिए हों या फिर ये आई आई टी के लिए हो…+

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