अमेरिका को गुडबाय कहने को लेकर पाकिस्तान संजीदगी से विचार कर रहा है। वह वाशिंगटन से तमाम कूटनीतिक रिश्ते तोड़कर पूरी तरह चीन का हो जाना चाहता है। समाचार पत्र ‘एक्सप्रेस ट्रिब्यून’ की एक रिपोर्ट के अनुसार पाक सरकार ने अपनी नई कूटनीतिक नीति के लिए तीन बिंदु सोच रखे हैं- अमेरिका के साथ राजनयिक संबंधों को धीरे-धीरे सीमित करना, आतंक विरोधी मुद्दों पर सहयोग कम करना और अफगानिस्तान संबंधी अमेरिकी रणनीति में असहयोग करना। अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने दक्षिण एशिया और अफगानिस्तान पर अपनी नई नीति की घोषणा करते समय कहा था कि इस्लामाबाद आतंकवादियों को सुरक्षित पनाह दे रहा है।

इस बयान के एक दिन बाद ही अमेरिकी विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन ने संकेत दिया था कि अगर इस्लामाबाद आतंकवादियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई नहीं करता है, तो अमेरिका की ओर से पाकिस्तान को मिले प्रमुख गैर-नाटो सहयोगी का ओहदा घटाया सकता है। इसके बाद ही पाकिस्तान ने अपनी नई डिप्लोमेटिक पॉलिसी पर काम शुरू कर दिया। सच्चाई यह है कि ओबामा के समय से ही अमेरिका पाकिस्तान को लेकर सख्त रुख अपनाने लगा था। पाकिस्तानी हुक्मरानों ने वक्त की नजाकत समझकर चीन के प्रति गर्मजोशी बढ़ानी शुरू कर दी है। इसका फायदा उठाकर चीन लगातार पाकिस्तान में निवेश कर रहा है।

उसकी वन बेल्ट वन रोड योजना में पाकिस्तान एक बड़ा भागीदार है। लेकिन पाकिस्तान का नया रुख उसके राजनेताओं और उच्च वर्ग के लिए परेशानी का सबब भी बन सकता है। नवाज शरीफ, आसिफ जरदारी, परवेज मुशर्रफ समेत कई नेताओं ने अमेरिका और इंग्लैंड में भारी दौलत इकट्ठा कर रखी है। पाकिस्तान का एलीट तबका वहां पढ़ने, नौकरी करने और बसने के ख्वाब देखता है। उसे यह कूटनीति शायद ही रास आए। दूसरी तरफ पाकिस्तान में एक ऐसा वर्ग भी है जिसे डर है कि कहीं चीन पाकिस्तान को अपना उपनिवेश न बना ले।

यह वर्ग चीन पाक इकनॉमिक कॉरिडोर का विरोध कर रहा है। इस कॉरिडोर के बदले पाकिस्तान ने अपना ग्वादर पोर्ट 40 वर्ष के लिए चीन को लीज पर दिया है। पाकिस्तान को 20 वर्ष के अंदर ब्याज समेत चीन के 70 अरब डॉलर वापस करने हैं, जबकि पाकिस्तान पर कुल कर्ज 170 अरब डॉलर का है। लोगों को डर है कि अगर पाकिस्तान कर्ज नहीं चुका पाया तो क्या होगा? पाकिस्तान के पूरी तरह चीन का प्रभाव क्षेत्र बन जाने से भारत के लिए भी मुश्किलें बढ़ेंगी। इस पड़ोसी देश से फिलहाल हमें चाहे जितनी भी परेशानियां झेलनी पड़ रही हैं, लेकिन इसका किसी और देश के अधीन हो जाना या यहां अराजकता फैल जाना हमारे लिए भी अच्छा नहीं होगा।

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