मैं बनारस के बिल्कुल पास के जिले आजमगढ़ का रहने वाला हूं। बचपन से हमारे गांव में बुढ़वा मंगल के किस्से कहे जाते थे। इस पर्व में बनारस के कई आशु कवि रात के वक्त गंगा नदी में बजरे पर सवार होकर निकलते थे। उनके आस-पास कई नावों पर शहर के लोग भी जमा होते थे। फिर सरकारों के खिलाफ, खासकर मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के खिलाफ व्यंग्य कविताओं का दौर शुरू होता था, जो धीरे-धीरे अश्लीलता की सीमाएं लांघता चला जाता था लेकिन इसका मकसद सत्ताधारियों का मजाक उड़ाना ही हुआ करता था। इस आयोजन का निशाना एक समय कमलापति त्रिपाठी हुआ करते थे। फिर सत्तर के दशक में इंदिरा गांधी और नब्बे के दशक में मायावती इस तीरंदाजी का लक्ष्य बनीं तो क्रमश: इस व्यंग्य का स्त्री विरोधी और दलित विरोधी चेहरा उजागर होना शुरू हुआ।

हास्य-व्यंग्य के साथ यह दिक्कत होती है कि काफी समय तक आपको अंदाजा ही नहीं होता कि मजे लेते हुए आप किसके पक्ष में और किसके खिलाफ खड़े हैं। जाहिर है, बुढ़वा मंगल की काव्य प्रक्रिया पर कोई स्टैंड लेने की स्थिति हमारी नहीं थी। मुझे नहीं पता कि आज भी वहां यह आयोजन होता है या नहीं, और होता भी है तो उसका स्वरूप क्या है लेकिन इस आयोजन के किस्सों का असर हम पर यह पड़ा कि बनारस की संस्कृति में व्याप्त लैंगिक शब्दावली और उसका भदेसपन हमें आकर्षित करने लगा। बोलचाल के दौरान जो बंदिशें हम पर आयद की जाती हैं, जिन्हें हम धीरे-धीरे अपने अवचेतन तक उतारते जाते हैं, उनसे मुक्त होना भला कौन नहीं चाहता। यही वजह है कि बाद में प्रसिद्ध हिंदी कवि सुदामा पांडे ‘धूमिल’ की कविताओं में जब हमने ऐसे प्रयोग देखे तो मन गदगद हो गया। लगा कि यही वह भाषा है, जिसमें हम अपने दिल की बात कह सकते हैं। इसका दूसरा पहलू तब भी अनदेखा ही रह गया।
इस प्रक्रिया का अगला चरण बने काशीनाथ सिंह, जो पहले लघु उपन्यास ‘अपना मोर्चा’ में, फिर ‘कासी का अस्सी’ में गालियों का एक सुगम्य पाठ प्रस्तुत करते हैं। इन दोनों किताबों का एक मजबूत पॉलिटिकल कॉन्टेंट है लेकिन जिस तरह श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास ‘राग दरबारी’ का सारा कॉन्टेंट लोगों को बिसर जाता है, सिर्फ इसमें व्याप्त मलत्याग के वर्णन ही ज्यादातर के दिमाग में चढ़े रह जाते हैं, उसी तरह काशीनाथ सिंह अपने पाठकों को अपनी रचनाधर्मिता पर छाई गालियों के लिए याद रहते हैं, बाकी उनके किस्से पीछे छूट जाते हैं। संभव है, इसके पीछे रचनाकारों का कोई दोष न हो। इनसे कहीं ज्यादा गालियां मैंने अमेरिकी थ्रिलर राइटर स्टीफन किंग के उपन्यासों में पढ़ी हैं लेकिन पढ़ने के अगले दिन ही उनका लेश भर भी दिमाग में नहीं रहता। इसकी यह वजह हो सकती है कि हिंदी हमारे लिए आज भी एक लंगोट बंधी भाषा है, जिसका खुला हुआ लंगोट ही हमारे जेहन में बचता है।
किस्साकोताह यह कि ताकतवर, बलात्कारी मिजाज के सांप्रदायिक मर्दों के पक्ष में खड़े होकर अट्टहास करने वाली बनारस की वह नई संस्कृति, जिसके विकृततम किस्से आजकल बीएचयू के घटनाक्रम के जरिए देश की हर लड़की के दिमाग में गूंज रहे हैं, वह अभी तक उसी पवित्र भदेस के आवरण में लिपटी हुई थी, जिसे हमने अपनी भाषाई मुक्ति के उपकरण के रूप में धारण कर रखा था। इस चीज के खिलाफ अब खुली लड़ाई होगी, जिसमें कुछ लोगों को भले ही अपनी जान देनी पड़े लेकिन इसे इसके हाल में अलमस्त अब तो नहीं छोड़ा जा सकता। हां, कोई और सकारात्मक चीज है, जिसकी आड़ में यह स्त्रीहंता प्रवृत्ति आज के बनारस पर राज कर रही है। वह चीज है बनारसी ठसक। बिना किसी का लिहाज किए तपाक से अपनी बात कह देना। सत्ताधारियों का खौफ न खाना, चाहे वे कोई भी क्यों न हों। बनारस की भाषा से लेकर जन-जीवन तक लड़ा जाने वाला सांस्कृतिक युद्ध इस ठेठ बनारसी ठसक को बचाने के लिए भी होगा, जिसे सत्ता की चापलूसी आज ठेलकर एक किनारे कर चुकी है।

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