नए उद्यमियों के हाथ मजबूत करने और युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराने की दिशा में केंद्र सरकार ने स्टार्टअप इंडिया के नाम से जो योजना शुरू की थी उसकी हालत ठीक नहीं है। दस हजार करोड़ रुपये के भारी-भरकम फंड के साथ जब यह योजना शुरू हुई तो लगा कि नए कारोबारियों के शुभ दिन निकट हैं लेकिन पिछले 20 महीनों में इस योजना से प्रत्यक्ष रूप में मात्र 72 स्टार्टअप ही फायदा उठा पाए हैं, जिन्हें सरकार की ओर से 69 करोड़ 50 लाख रुपए की फंडिंग मिली है। फंडिंग की समस्या के चलते पिछले साल 212 स्टार्टअप बंद भी हो चुके हैं। पिछले एक साल के दौरान ऐसी कंपनियों में काम करने वाले 70 हजार से भी ज्यादा लोग बेहद मुश्किल हालात में हैं। दो साल पहले जब यह योजना शुरू हुई थी तो सर्च इंजनों और जॉब पोर्टलों पर सबसे ज्यादा सर्च होने वाला कीवर्ड ‘जॉब्स इन स्टार्टअप’ था लेकिन अब यह सर्च से बाहर है। इतना ही नहीं, इन स्टार्टअप्स ने कई प्रतिभाशाली युवाओं को ऑफर लेटर देकर भी नौकरियां नहीं दीं जिसके चलते देशभर के आईआईटी संस्थानों ने इनपर सालभर का बैन लगा दिया।

पिछले महीने जब आईआईटी के कुछ छात्रों ने कुछ बड़े स्टार्टअप के साथ काम करने की इच्छा जाहिर की तब जाकर इन कंपनियों के लिए आईआईटी के दरवाजे खोले गए हैं। वैसे देसी स्टार्टअप्स को सरकार की ओर से ही चोट नहीं पहुंच रही है। विदेशों से भी इन्हें सपॉर्ट मिलना बहुत कम हो चुका है। भारतीय स्टार्टअप में 30 फीसदी का निवेश करने वाली अमेरिकी टाइगर ग्लोबल ने पिछले साल कोई निवेश नहीं किया है। स्टार्टअप की सरकारी वेबसाइट के मुताबिक अब तक तकरीबन पौने दो लाख लोगों ने फंड के लिए आवेदन किया है। इनमें चार हजार लोगों को मान्यता तो दी गई पर फंड सिर्फ 72 को ही जारी किया गया। मान्यता मिलने से टैक्स और कानून में कुछ रियायतें मिलनी शुरू हो जाती हैं लेकिन इसके लिए भी काफी सरकारी पापड़ बेलने पड़ते हैं। स्टार्टअप की सरकारी परिभाषा देश में मौजूद टैलंट का दायरा सीमित कर देती है क्योंकि इसके मुताबिक इसका प्रौद्योगिकी या बौद्धिक क्षमता से संचालित होना जरूरी है। इसी के चलते कई स्टार्टअप कंपनियों ने अपना रजिस्ट्रेशन देश के बाहर कराया है।

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