जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण आदेश में साफ किया कि घरेलू हिंसा एक्ट में दूसरी पत्नी को संरक्षण का अधिकार नहीं दिया गया है। लिहाजा, दूसरी पत्नी की ओर से पति के खिलाफ दायर याचिका खारिज की जाती है।

मंगलवार को न्यायमूर्ति एसके पालो की एकलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। इस दौरान याचिकाकर्ता कोतमा निवासी शोभा देवी की ओर से दलील दी गई कि पति रामकृपाल मिश्रा ने 20 वर्ष साथ गुजारने के बावजूद घरेलू हिंसा के जरिए प्रताड़ित करना शुरू कर दिया।

यही नहीं भरण-पोषण की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया। इसी वजह से प्रथम श्रेणी न्यायिक दंडाधिकारी की कोर्ट में केस दायर किया गया। वहां से अंतरिम भरण-पोषण के लिए घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा-12 के तहत 2500 रुपए मासिक भुगतान का आदेश पारित किया गया।

पति ने सेशन कोर्ट में दी चुनौती

पति रामकृपाल ने जेएमएफसी कोर्ट के आदेश का पालन करने के स्थान पर उक्त आदेश के खिलाफ सेशन कोर्ट में अपील दायर कर दी। वहां दलील दी गई कि सुप्रीम कोर्ट ने इन्द्रा शर्मा विरुद्ध विवेक शर्मा के मामले में पहले ही साफ कर दिया है कि घरेलू हिंसा अधिनियम-2005 की धारा-2 (एफ) के तहत दूसरी पत्नी को लिव-इन-रिलेशनशिप के दायरे में मानते हुए किसी प्रकरण की भरण-पोषण संबंधी राहत नहीं दी जा सकती। सेशन कोर्ट ने तर्क से सहमत होकर जेएमएफसी कोर्ट का पूर्व आदेश पलटते हुए अपील स्वीकार कर ली।

दूसरी पत्नी चली आई हाईकोर्ट

सेशन कोर्ट के उक्त आदेश के खिलाफ दूसरी पत्नी ने हाईकोर्ट में रिवीजन प्रस्तुत कर दिया। जिसमें मांग की गई कि सेशन कोर्ट के अनुचित आदेश को निरस्त करते हुए जेएमएफसी कोर्ट के पूर्व में पारित भरण-पोषण राशि संबंधी आदेश को बहाल कर दिया जाए।

हाईकोर्ट ने पति रामकृपाल की ओर से अधिवक्ता केके पाण्डेय, आरती द्विवेदी, कौशलेश पाण्डेय और किरण दुबे के तर्क सुनने के बाद रिजवीन खारिज कर दी। इसी के साथ दूसरी पत्नी को झटका लगा, जबकि पति को राहत मिल गई।

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