प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी पार्टी बीजेपी के बारे में कहा है कि उसको चुनावों से ऊपर उठकर सोचना और काम करना चाहिए। पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि हमें जनतंत्र को चुनावी दायरे से आगे ले जाना है ताकि इसमें जनता की भागीदारी बढ़ाई जा सके। हालांकि कुछ दिन से ऐसी चर्चा चल रही है और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने बैठक की शुरुआत में पिछली बार से बड़ी जीत अगले आम चुनाव में दर्ज करने का आह्वान करके ऐसा संकेत भी दिया कि चुनाव तय समय से पहले कराए जा सकते हैं। इस कार्यकारिणी का मकसद चुनाव के लिए पार्टी को तैयार करने का है। बहरहाल, जनता की भागीदारी पर जोर देने के पीएम के आग्रह से स्पष्ट है कि वह जनता से संवाद में सरकार और पार्टी की कुछ खामियों को चिह्नित करना चाहते हैं। उन्हें पता है कि उनकी नीतियां भले ही आकर्षक दिखती हों पर लोगों के जीवन पर उनका कोई अच्छा असर नहीं दिख रहा।

बीजेपी की खुशकिस्मती है कि विपक्ष इस समय कमजोर और विभाजित है। उसके पास ऐसा कोई दमदार नेता भी नहीं है जो जनता के आक्रोश का प्रतिनिधित्व करते हुए सरकार को चुनौती दे सके। इसके बावजूद पिछले कुछ महीनों में अलग-अलग तबके मोदी सरकार के खिलाफ जिंदगी-मौत की लड़ाई में उतरे हैं। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान जैसे बीजेपी शासित राज्यों के किसानों ने अपनी उपज का सही दाम न मिलने को लेकर लंबे प्रदर्शन किए और कुछेक जगहों पर पुलिस की गोलियों से मारे गए। स्वयं गुजरात में दलितों पर हुए गोरक्षकों के हमले के विरोध ने राज्यव्यापी आंदोलन का रूप ले लिया। सरकार का सबसे सुदृढ़ समर्थक व्यापारी तबका भी जीएसटी को लेकर आंदोलन में उतरा और उसकी बेचैनियां आज भी कम नहीं हुई हैं। छात्रों के सरकार विरोधी तेवर लगभग हर विश्वविद्यालय में दिखाई पड़ रहे हैं। बीजेपी की सरकारों और इसके जन संगठनों ने इन विरोध प्रदर्शनों को जनता की शिकायत के रूप में लेने के बजाय इसे विपक्षी साजिश बताया और ताकत के बल पर इन्हें कुचलने की कोशिश की। सत्तारूढ़ दल को समय रहते समझ लेना चाहिए कि जिस तरह आज उसे देश में हुई हर अच्छी बात का फायदा मिल रहा है वैसे ही कल हर समस्या का ठीकरा भी उसी के सिर फूटेगा। कारण? न तो देश में कहीं विपक्ष की कोई हैसियत बची है, न ही बीजेपी के सहयोगी दल उसकी नाकामियों में हिस्सेदारी करने वाले हैं। संभव है, पार्टी में ज्यादातर लोग चुनावी जीत के हल्ले में इस समस्या का समाधान देख रहे हों लेकिन प्रधानमंत्री के बयान से ऐसा लगता है कि वे ऐसी किसी गलतफहमी में नहीं हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here