देश के सामने अचानक एक बहुत बड़ी दुविधा आ खड़ी हुई है। दुविधा यह कि भारत का टेलिकॉम सेक्टर असाधारण ऊंचाइयां छूने जा रहा है या फिर इसके बिल्कुल विपरीत मृत्यु के कगार पर खड़ा है। भारत के आला उद्योगपति स्वर्गीय धीरूभाई अंबानी के बेटों ने ठीक इन्हीं आशयों वाले बयान एक ही दिन, 27 सितंबर 2017 को लगभग एक ही समय जारी किए। मुकेश अंबानी ने पहली इंडिया मोबाइल कांग्रेस को संबोधित करते हुए कहा कि ‘भारत में अभी डेटा की स्थिति वही है, जो कभी दुनिया के कई देशों में कच्चे तेल की हुआ करती थी। देश अभी चौथी औद्योगिक क्रांति के मुहाने पर खड़ा है, जिसमें टेलिकॉम सेक्टर को अग्रणी भूमिका निभानी है।’दूसरी तरफ अनिल अंबानी ने अपनी कंपनी रिलायंस कम्यूनिकेशंस के शेयरहोल्डरों की सभा में कहा कि ‘देश का टेलिकॉम सेक्टर इंटेंसिव क्रिटिकल केयर यूनिट (आईसीसीयू) में पड़ा है और इस पर एकाधिकार का खतरा मंडरा रहा है।

इसमें कोई शक नहीं कि पिछले ही साल टेलिकॉम के धंधे में उतरी मुकेश भाई की कंपनी ने देखते-देखते अपना धंधा बहुत बड़ा बना लिया है। रिफंडेबल 1500 रुपये में, यानी सिद्धांतत: मुफ्त में करोड़ों लोगों को इस दीवाली से पहले 4जी फोन मुहैया कराने की उसकी योजना ने देश की सभी जमी-जमाई टेलिकॉम कंपनियों भारती एयरटेल, वोडाफोन, आइडिया वगैरह की नींद उड़ा रखी है। अभी दो साल पहले इन सभी ने बैंकों से हजारों करोड़ रुपये लोन लेकर सरकार से काफी महंगा स्पेक्ट्रम खरीदा है। इसके लिए जरूरी जमीनी ढांचा खड़ा करने की प्रक्रिया भी वे पूरी नहीं कर पाई हैं लेकिन इसका कोई कारोबारी इस्तेमाल वे कर पातीं, इसके पहले ही अचानक जैसे हवा से धंधे में उतर आई मुकेश अंबानी की कंपनी रिलायंस जियो ने लगभग मुफ्त में डेटा और वॉयस कॉल की सुविधा मुहैया कराकर उन्हें भौंचक्का कर दिया। अभी मुफ्त का 4जी फोन आने से उन्हें नए ग्राहक मिलने पहले ही बंद हो चुके हैं। यानी आने वाले एक साल में इनमें से ज्यादातर कंपनियां या तो दिवालिया हो जाएंगी या जैसे-तैसे बिकने को तैयार हो जाएंगी।
इसका सबसे बड़ा नमूना अभी मुकेश अंबानी के छोटे भाई अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस कम्युनिकेशंस बनी हुई है, जो दिवालिया घोषित होने के ठीक पहले की प्रक्रिया से गुजर रही है। अनिल भाई ने इसे व्यापारिक समझौते के नाम पर बेचने की कोशिश की लेकिन कुछ बड़े शेयरहोल्डरों के ऐतराज के बाद उन्हें अपने कदम पीछे खींचने पड़े। कंपनी पर कर्जे बहुत ज्यादा हैं और वसूली करने वाले रोज ही दरवाजा खटखटा रहे हैं। धंधे की डूबती हालत देखते हुए कोई बैंक इस कंपनी को नया कर्ज देने को भी तैयार नहीं होगा। ऐसे में नैशनल कंपनी लॉ ट्राइब्यूनल कब रिलायंस कम्यूनिकेशंस को दिवालिया घोषित करने की पहल करता है, बाजार को सिर्फ इस सूचना का इंतजार है। यानी अनिल भाई की इस बात में कुछ झोल हो सकता है कि भारत का टेलिकॉम सेक्टर फिलहाल आईसीसीयू में पड़ा हुआ है लेकिन यह बात तो पक्की है कि उनकी खुद की टेलिकॉम कंपनी का ठिकाना अभी आईसीसीयू और मोर्चरी के कहीं बीच में ही है।

किस्साकोताह यह कि बुधवार को कही गई दोनों ही अंबानियों की बातें अपनी-अपनी जगह सही हैं। भारत में टेलिकॉम सेक्टर बहुत बड़े बदलाव के मुहाने पर खड़ा है लेकिन यहां की ज्यादातर टेलिकॉम कंपनियों पर बहुत बड़ा संकट भी मंडरा रहा है। कोई कह सकता है कि यह संकट अगले दो-चार साल में हल हो जाएगा, जब देश में टेलिकॉम सर्विस कंपनी के नाम पर दो या ज्यादा से ज्यादा तीन कंपनियां ही बचेंगी। लेकिन जो लोग मुकेश भाई की वर्किंग स्टाइल से परिचित हैं, वे यह भी जानते हैं कि अपने धंधे में वे कंपिटीशन की कोई गुंजाइश ही नहीं छोड़ते।
देश में कैसे बदलाव होंगे, इसका क्या फायदा देश को मिलेगा, इस बात को लेकर वे कितने चिंतित रहते हैं, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 2007-08 में दुनिया में बढ़ती कच्चे तेल की कीमतों के अनुरूप पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ाने से यूपीए सरकार ने मना कर दिया तो धीरूभाई ने देश में ये चीजें बेचनी ही बंद कर दीं और अपने पेट्रोल पंपों पर ताला लगाकर अपना माल अफ्रीका रवाना कर दिया। उनके द्वारा सरकार से मिट्टी के मोल खरीदे गए तेल के कुएं उस कठिन संकट के दौर में देश के रत्तीभर भी काम नहीं आए। ऐसा भविष्य में डेटा के साथ भी नहीं होने वाला है, कौन कह सकता है भला?

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