साइंस-टेक्नॉलजी में एक नए युग की शुरुआत का साक्षी बनने का सौभाग्य हर पीढ़ी को प्राप्त नहीं होता लेकिन हमारी पीढ़ी इस दृष्टि से एक खास मामले में सौभाग्यशाली है। हम ग्रैविटेशनल वेव ऐस्ट्रॉनमी (गुरुत्वीय तरंग खगोलशास्त्र) के प्रारंभ के साक्षी बन चुके हैं। पिछले साल अमेरिका में लुईजियाना और वॉशिंगटन प्रांतों में बनी लीगो वेधशालाओं ने पहली बार गुरुत्वीय तरंग की शिनाख्त की थी। वह सिलसिला 27 सितंबर की घोषणा के साथ इस तरह की चौथी शिनाख्त दर्ज कर चुका है लेकिन इस बार की, यानी चौथी शिनाख्त की खासियत यह है कि इसमें अमेरिका से बाहर, इटली की एक गुरुत्व तरंग वेधशाला वर्गो भी शामिल है।
जिस तरह हम दो आंखों से देखकर किसी चीज की दूरी का अंदाजा लगाते हैं और जीपीएस कम से कम छह (तीन+तीन) उपग्रहों के जरिये धरती पर किसी चीज की लोकेशन ठीक-ठीक बता देता है, उसी तरह तीन जगहों से लिए गए गुरुत्वीय तरंगों के प्रेक्षण लगभग सटीक ढंग से बहुत अधिक ऊर्जा प्रक्षेपण वाली किसी अंतरिक्षीय घटना के स्रोत का अंदाजा दे सकते हैं। 27 सितंबर को घोषित की गई यह घटना 1 अरब 80 करोड़ साल पुरानी है, जब हमारे सूर्य के लगभग 31 और 25 गुना वजनी दो ब्लैक होल आपस में टकराए और तीन सूर्यों के वजन के बराबर ऊर्जा छोड़ते हुए 53 सूर्यों जितने वजनी ब्लैक होल में बदल गए।

इसके पहले दर्ज की गई तीनों घटनाएं भी 30 सूर्यों से थोड़ा कम या ज्यादा वजन वाले ब्लैक होलों के आपस में टकराने की थीं लेकिन वे ब्रह्मांड में कहां घटी थीं, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल था। पिछले महीने दर्ज की गई घटना की सूचना लीगो की पकड़ में आने के एक मिनट के अंदर दुनिया के 25 टेलिस्कोपों तक रवाना कर दी गई, जिन्होंने तुरत-फुरत अपने कैमरे उसकी संभावित दिशा में घुमा दिए। इनमें प्रकाश को दर्ज करने वाले टेलिस्कोपों से लेकर एक्स-रे और गामा-रे टेलिस्कोपों तक विविध प्रकार के दूरदर्शी शामिल थे। यह और बात है कि वे कुछ भी देख नहीं पाए, क्योंकि घटना का स्रोत पकड़ पाने के मामले में लीगो का हाथ कुछ ज्यादा ही तंग था।
कितना तंग?
इसका अंदाजा इस बात से लगाएं कि हमारा चंद्रमा धरती से नजर आने वाले आकाश का 1 वर्ग डिग्री हिस्सा भर घेरता है, लेकिन लीगो ने 1000 वर्ग डिग्री (और समझाकर कहें तो 31.5 डिग्री लंबाई और इतनी ही चौड़ाई वाले) इलाके की ओर इशारा किया था। ऐस्ट्रॉनमी में इस सूचना का कोई मतलब नहीं है। इसके विपरीत दो के बजाय तीन वेधशालाओं से लिए गए 27 सितंबर के प्रेक्षण में घटना का स्रोत 60 वर्ग डिग्री (साढ़े सात डिग्री गुणे साढ़े सात डिग्री) के इलाके में बताया गया। यह दायरा भी काफी बड़ा है और अभी तक मालूम नहीं कि इस बार कोई टेलिस्कोप कुछ देख पाया है या नहीं लेकिन देखे जाने की संभावना इस बार कई गुना बढ़ गया है।
आने वाले दिनों में जब चीन, भारत और जापान में भी गुरुत्वीय तरंगों को दर्ज करने की व्यवस्था हो जाएगी, तब शायद टेलिस्कोपों को चंद्रमा जितने दायरे वाला ही आकाश खंगालना पड़ेगा और तब संभवत: उच्च ऊर्जा प्रक्षेपण वाली घटनाओं को एक साथ दो तरीकों से दर्ज किया जा सके। एक रोशनी या इसके करीब पड़ने वाली एक्स-रे, गामा-रे आदि के जरिए और दो- गुरुत्वीय तरंगों के जरिए, जो कि दुनिया के लिए एक बिल्कुल नई चीज है। यह कुछ-कुछ ऐसा है, जैसे दुनिया का नक्शा आप जहाजी यात्राओं के जरिए और उपग्रह द्वारा लिए गए प्रेक्षण के जरिए बनाकर दोनों को टैली कर सकें। ब्रह्मांड हमारे सामने ज्यादा साफ शक्ल में नुमायां हो रहा है। क्या हम दिमागी तौर पर इसे देखने के लिए तैयार हैं?

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here