दो दिन पहले मध्य प्रदेश के मुरैना शहर में एक आरटीआई ऐक्टिविस्ट मुकेश दुबे को पीट-पीट कर मार डाला गया। इससे पहले रविवार को केरल के वर्काला कस्बे में पत्रकार संजीव गोपालन को कथित तौर पर पुलिस वालों ने न केवल पीटा बल्कि पत्नी और बेटी के सामने उनके कपड़े उतार दिए। जनहित से जुड़ी सूचनाएं जनता तक पहुंचाने के काम में लगे इन दोनों तरह के लोगों पर हमले इधर कुछ ज्यादा ही बढ़ गए हैं। पत्रकार तो लंबे समय से पेशागत चुनौतियों का सामना करते आ रहे हैं, मगर अब आरटीआई ऐक्टिविस्ट भी लगातार हमले का शिकार होने लगे हैं।

सूचना का अधिकार एक दशक पहले लोगों को मिला ऐसा पहला बड़ा अधिकार था जिसने सही मायनों में प्रशासनिक तंत्र में जनता का खौफ पैदा किया। सरकारी अमला इसको लेकर कभी सहज नहीं हो पाया लेकिन शुरू में उसने सूचना के अधिकार को गंभीरता से लिया था। सूचनाएं सचमुच दी जा रही थीं और लूटतंत्र पर इसका असर भी देखा जा रहा था। इसके चलते पिछली यूपीए सरकार में भी यह सवाल उठने लगा था कि ऐसी दबाव की स्थिति में आखिर काम कैसे होगा? अफसर निर्णय कैसे लेंगे, जब उन्हें यह डर सताता रहेगा कि कल को उनका फैसला उनके सिर पर तलवार बनकर गिर सकता है? जरूरत इस सवाल का ऐसा जवाब तलाशने की थी जिससे सूचना का अधिकार और ज्यादा प्रभावी हो, साथ ही सरकारी अमले की जायज चिंता भी दूर हो लेकिन सरकार बदलने के बाद न केवल तंत्र के अंदर सूचनाओं की मांग को टरकाने की प्रवृत्ति तेज हुई बल्कि सूचनाएं निकलवाने और उन्हें लोगों तक ले जाने के काम में लगे लोगों को डराने-धमकाने और उन्हें हतोत्साहित करने की हरकतें बहुत ज्यादा बढ़ गईं। इस क्रम में पत्रकार और आरटीआई ऐक्टिविस्ट अधिकाधिक असुरक्षित होते गए। पत्रकारों व ऐक्टिविस्टों की सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकारों की जिम्मेदारी है लेकिन इसमें लगे लोगों को भी समझना होगा कि जनहित का काम जन भागीदारी के बिना संभव नहीं है। सरकार की सरपरस्ती नहीं, जनता का समर्थन ही उनका कवच बनेगा।

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