राम की वापसी कब होगी? कितना लंबा है राम का वनवास? राम वनवास से कभी लौटेंगे भी? राम हर बरस टुकड़ों में इतना ही लौटेंगे, जितना हम दीवाली पर उन्हें लौटाएंगे। राम दरअसल सिर्फ रामलीलाओं में ही लौटते हैं। वह स्वयं कभी लौटेंगे, लौटाए जाएंगे- हमें शक है। राम रामराज्य से परिभाषित हैं। रामराज्य जब तक सत्ता द्वारा हकीकत में अनूदित नहीं होगा, पुरुषोत्तम राम और रामराज्य एक साथ एक युग में कहां स्थापित होंगे? कैसे स्थापित होंगे? रामलीलाओं में राम जरूर हर बरस अभिनीत होते चलेंगे। हर बरस रावण का पुतला जलाकर हम भी अयोध्या में दीवाली मनाते चलेंगे।
राम और रावण आमने-सामने से एक दूसरे की खूबियों-खामियों को आत्मसात कर चुके हैं। दोनों को दोनों के मंत्रालयों से बहुत कुछ लेना है-देना है। किसी एक का एकछत्र राज्य करीब-करीब खत्म हो चुका है। जहां कभी राम थे, वहां रावण है। जहां रावण था वहां राम की झांकियां हैं। सच तो यह है कि राम आज भारतीय मानस के अभिनय की समग्र संज्ञा हो चुके हैं। उन्हें हम सिर्फ मंच पर प्रस्तुत करते हैं। राम का देवत्व, उनके तापसी वस्त्र, राजसी मुकुट और धनुष-बाण उनकी आत्मा, उनके देवत्व से अलग सिर्फ रामलीला के तामझाम का स्वरूप होकर रह गए हैं।

राम का संघर्ष, जिसकी टकराहट से छनकर राम के उदात्त व्यक्तित्व का निखार हुआ था, वह रामलीला की चकाचौंध के परदे के पीछे घोर अंधेरी अमावस में डूबा हुआ है। हमारे अंदर अन्याय से जूझने के संकल्प ठंडे हो चुके हैं और किसी शिला-परत के नीचे जा बिछे हैं। बाकी है सिर्फ एक अभियान, ढोल और कमेटी। हां, रामलीला के नायक जरूर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम हैं। वही राम हैं, वही विजयदशमी हैं, वही दीवाली हैं। दीवाली का सार्वजनिक स्वरूप भी वही है जिससे हाट-बाजार आलोकित किए जाते हैं लेकिन अभावों में डूबे दिल नहीं, सिर्फ संपन्न घर इस आलोक में उजागर किए जाते हैं।
जिन बस्तियों, जिन लोगों में तड़कीली-भड़कीली लीलाएं जुटाने की सामर्थ्य नहीं, क्या वे भी पुरुषोत्तम राम की वापसी की राह ताका करते हैं? जी नहीं। वे तो बेसब्री से, बेबसी से दीयों के अंबारों की, पटाखों की, मिलावटी मिठाइयों की, हीरे-जवाहिरात की, झिलमिल कपड़ों के इंतजार में, हसरतों को मुट्ठी में कैद कर सिर्फ तक रहे हैं उस दरिद्र अंधियारी दीवाली को, जहां सर डाले बेशुमार जिंदगियां सिर्फ इंतिजार ही इंतिजार में अंधेरे से पुत जाती हैं। गर्क हो जाती हैं। वक्त वहां कोई मतलब नहीं रखता। एक दशक, एक जिंदगी, एक पीढ़ी कुछ नहीं।
राम के आगमन ने जिस दीपक को सुरक्षा से उठाकर लोक-पंक्ति में सजा दिया है और इस तरह उसके एकांत की गरिमा तक लूट ली है, उसी की लौ के सहारे हम दीवाली के धनाढ्य त्यौहार को अतीत की रंग-बिरंगी पताकाओं से सजाकर, लोकमानस की अभिव्यक्ति बताकर कब तक अपने माथों पर चढ़ाते रहेंगे?

सम्राटों, साम्राज्ञियों, राजकुमारों, रानियों-पटरानियों की राजसी वेशभूषाओं के साथ-साथ कभी उनकी भटकी-भूली आत्माओं को भी हम क्यों न धूप दिखाएं और अगर उनमें कोई भुरभुराहट जिंदा है तो उन्हें फिर आज के लोकमानस से जोड़ने का जुगाड़ करें। खोखली सामंती तहों में नहीं, बराबरी के आधार पर, जहां हर एक हर दूसरे सा है। हर दूसरा हर तीसरे सा। देवताओं की विशिष्टता और सामंती मूल्यों को सिर्फ मंचों पर झम्म-झम्म वस्त्रों और आभूषणों के बल पर कब तक जिंदा रखिएगा? राम अगर लोक की मर्यादा के स्वामी हैं तो जान लीजिए, वह भेष बदलकर रामलीला में दर्शकों की भीड़ में बैठे किन्हीं बीत गए, चुक गए मूल्यों और उनके जीर्ण-शीर्ण कंकालों को देखकर खुद ही सर हिला रहे होंगे। सोचने की मुद्रा में अपने आप से कह रहे होंगे कि नहीं, ऐसा नहीं, अब और ऐसा नहीं।
हमारे जिस मानस ने राम जैसे पुरुष की कल्पना कर उसे भारतीय मन में स्थापित किया है, ऐसे जीवन चरित्र को अवतारी बनाकर केवल जिल्दों में संजो न डालिए। उसे जोड़िए लोक-चिंता से। सत्ता के संदर्भ से। आज की जिंदगी से। केवल कथाओं, कीर्तनों और धार्मिक अनुष्ठानों के प्रसंगों को दुहराते चले जाने से कुछ न होगा।
ये सब सम्पन्न वर्ग की खोखली आस्था और विश्वास के नुमायशी प्रतीक भर हैं। हमें राम का इंतजार है। जरूर है, मगर क्या करें? राम को हमारी स्वीकृति से वनवास मिल चुका है। हमने उन्हें जिंदगी के साक्षात से हटाकर मूर्तियों में स्थापित कर दिया है। जो मूल्य स्थापित कर दिए जाते हैं, वे सर्वसाधारण की जिंदगी से कटकर मंदिरों और देवालयों की धरोहर हो जाते हैं। मूल्यों के नाम पर क्या कोई भी स्थापना कालातीत हो जाती है? हो सकती है?
राम वनवास से लौटेंगे नहीं, वे नहीं लौटेंगे। अगर हम उन्हें आज के मानस से, आज के चिंतन से नहीं जोड़ेंगे। शायद राम को स्वयं अब नए जन्म की प्रतीक्षा है। अगर ऐसा नहीं होता तो नायक और खलनायक एक से दिखने लगेंगे। अगर कहीं लंकापति अपनी सामर्थ्य और सत्ता के बल पर अपने को राम घोषित कर दें तो राम को अपनी आइडेंटिटी के सबूत इकट्ठे करने पड़ेंगे और हमारी युगों पुरानी अच्छाई और बुराई का मुकदमा हम हार जाएंगे।
फरियाद हम कहां करेंगे? क्या रामलीला के मंच पर? गजब हो जाएगा। वहां राम के असंख्य स्वरूप हैं, जो राम कहलाने के हकदार हैं। दशहरा है, दीवाली है, राम नहीं हैं, सिर्फ राम का नाम है।

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