हाल में प्रकाशित वरिष्ठ बीजेपी नेता यशवंत सिन्हा और सांसद वरुण गांधी के संपादकीय लेखों ने सत्तारूढ़ दल को असहज कर दिया है। ‌‌वरुण ने जहां पार्टी लाइन से अलग जाते हुए रोहिंग्या शरणार्थियों को शरण देने की बात कही, वहीं पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने नोटबंदी और जीएसटी जैसे केंद्र के आर्थिक उपायों की धज्जियां उड़ा दीं। भारतीय राजनीति में यह कोई अनोखी बात नहीं है। सत्तारूढ़ दल के भीतर से सरकारी नीतियों की आलोचना की हमारे यहां पुरानी परंपरा रही है लेकिन इन दोनों मामलों में सरकार की प्रतिक्रिया चौंकाने वाली रही। केंद्रीय मंत्रियों और पार्टी के नेताओं ने अलग राय रखने वाले अपनी ही पार्टी के इन दोनों नेताओं के राष्ट्रप्रेम पर सवाल खड़ा किया और उन्हें कुंठित अथवा निहित स्वार्थ से प्रेरित बताया। यशवंत सिन्हा के बेटे और वित्त राज्य मंत्री जयंत सिन्हा ने जवाबी लेख लिखकर केंद्र सरकार की आर्थिक नीति का बचाव किया। दूसरी तरफ यशवंत सिन्हा के समर्थन में बीजेपी नेता शत्रुघ्न सिन्हा आगे आए। उन्होंने कहा कि यशवंत सिन्हा ने आर्थिक स्थिति को लेकर सरकार को आईना दिखाया है, उनकी बातों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए।

ध्यान आता है, 1998 से 2004 तक चली अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के कई फैसलों का बीजेपी और संघ के भीतर से प्रबल विरोध हुआ। स्वदेशी जागरण मंच और भारतीय मजदूर संघ ने अटल सरकार के खिलाफ दिल्ली में बड़े प्रदर्शन किए लेकिन याद नहीं पड़ता कि सरकार की तरफ से किसी मंत्री ने इस विरोध की निंदा की हो या इसे गलत बताया हो। कांग्रेस में तो खैर बाकायदा दक्षिण और वाम खेमे रहते आए हैं और सरकार को उनके बीच से ही अपने लिए रास्ता निकालना पड़ता रहा है। मनमोहन सिंह की सरकार में नटवर सिंह, मणिशंकर अय्यर और जयराम रमेश जैसे लोग सरकार के कई कदमों की तीखी आलोचना के लिए चर्चित हुए लेकिन इनमें से एक को भी अपनी राय के लिए पार्टी में अलग-थलग नहीं होना पड़ा। आलोचना को नेतृत्व विरोधी गतिविधि माने जाने के उदाहरण अतीत में या तो इंदिरा गांधी के समय में मिलते थे या अभी मिल रहे हैं। बीजेपी में नरेंद्र मोदी का प्रभाव बढ़ने के बाद से दृश्य कुछ ऐसा बन गया है कि उनकी सरकार की आलोचना करने वाला कोई भी व्यक्ति न सिर्फ मोदी और बीजेपी का बल्कि देश विरोधी है। दूसरे शब्दों में कहें तो मोदी ब्रैंड ने बीजेपी को चुनाव में लगातार जीत दिलवाई है लेकिन पार्टी के भीतर का जनतांत्रिक माहौल उसने खत्म कर दिया है। नतीजा यह है कि आज सरकार को अपनी गलतियां दिखाई ही नहीं पड़ रहीं। ‘अच्छे दिन’ वाले इस दौर में यशवंत सिन्हा ने लोकतंत्र के अच्छे दिनों की याद दिलाई है। बीजेपी को ही नहीं, हर पार्टी को अपने भीतर से उठने वाले असहमति के स्वर ध्यान से सुनने चाहिए।

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