हम एक ऐसे युग से गुजर रहे हैं जिसमें मनुष्य की मानव की सोच इतनी बदल गई है कि वह अंतरिक्ष में भी जीवन को यथार्थ कर सकता है। लेकिन उसके साथ ही उसने शस्त्र भी इतने तैयार कर लिए हैं कि वह कुछ ही क्षणों में समस्त मानव जाति को नष्ट कर सकता है। सृजन और संहार की असीम शक्ति ने एक ऐसी स्थिति उत्पन्न की है जो एक तरफ अनुसंधानों के नए प्रतिमान गढ़ रहा है तो दूसरी ओर जीवन-मूल्यों की अस्वीकृति को भी बढ़ावा दे रहा है। ऐसी परिस्थिति में महात्मा गांधी को याद करना लाज़िमी है जो शायद अब उतने याद नहीं आते।

नोबेल पुरस्कार विजेता प्रफेसर गुन्नार मिर्डेल ने अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा था कि उनके लिए भारत एक तीर्थ के समान है और वे इसी पवित्र भावना से भारत आते हैं परंतु अब वे भारत को बुनियादी समस्याओं में उलझता देखते हैं तो चिन्ता होती है। प्रफेसर मिर्डेल इस उलझन का एकमात्र कारण यह मानते हैं कि भारत कुछ हद तक महात्मा गांधी को भूल गया। आज विश्व के साथ-साथ भारत को महात्मा गांधी की सबसे ज्यादा जरूरत है। जिस देश की 50 प्रतिशत से ज्यादा जनसंख्या 35 साल के आसपास नजर आ रही हो उस देश का युवा महात्मा गांधी को अप्रासंगिक माने यह उचित नहीं लगता। बापू का नाम ‘मजबूरी’ से जोड़ दिया जाता है। युवाओं को यह पता होना चाहिए कि जब पूरा देश दिल्ली में आजादी का जश्न मना रहा था तब गांधी उपवास पर बैठे थे क्योंकि नोआखाली के दंगों ने उन्हें व्यथित कर दिया था। अल्बर्ट आइंस्टीन ने मानो सही ही कहा था कि आने वाली पीढ़ियों को विश्वास करने में कठिनाई होगी कि गांधी जी जैसा कोई हाड़-मांस से बना मनुष्य इस धरती पर पैदा हुआ था।
यह दुर्भाग्य है कि आज भी हमारा देश गरीबी, बेरोजगारी, जातिवाद और भ्रष्टाचार जैसी बीमारियों से जूझ रहा है। गांधी की राजनीति ‘मैं’ और ‘तुम’ में सिमटी नहीं थी बल्कि अहम् से आगे ‘हम’ को महत्व देती थी। जब आजादी के बाद एक अमेरिकी पत्रकार ने गांधी से यह पूछा कि अब उनकी सबसे बड़ी चिंता क्या है? तब गांधीजी ने कहा कि भ्रष्टाचार से देश को मुक्त रखना। उन्हें शायद यह आभास था कि स्वतंत्रता अपने साथ अनियंत्रित मन भी लेकर आती है जो काबू में ना रखा गया तो विध्वंस होना निश्चित है। यह दुर्भाग्य है कि गांधी के देश में गांधी की अहिंसात्मक नीतियों पर जनता का भरोसा नहीं रहा है। आज का भारत बात-बात पर हिंसा के लिए तत्पर दिखता है। विश्व के संग भारत भी आतंकवाद और हिंसा से जूझ रहा है। महात्मा गांधी ने अहिंसा को वीरों का शस्त्र बताया। उनके अनुसार अहिंसा के रास्ते पर वही चल सकता है जो मानवीय संवेदनाओं और सत्य में जीता है। आखिर कायर को कैसे अहिंसा का पाठ पढ़ाया जाए! अहिंसा तो वीरों की नियति में है। वे महात्मा गांधी ही थे जिन्होंने मन के अंदर चलने वाली गलत भावनाओं को भी हिंसात्मक बताया। जब हम आज भारत में बढ़ती असामाजिक घटनाओं को देखते हैं तो लगता है कि महात्मा गांधी की अहिंसा की भावना सभी के लिए एक आइना है। आज हमारे बच्चे घर और बाहर कहीं भी सुरक्षित नहीं रह गए हैं। बाहरी और आंतरिक हिंसात्मक और पाश्विक प्रवृतियों ने मानो सभी को सहमा दिया है। इसलिए यह जरूरी है कि हमारे युवा और तमाम लोग विश्व के सामने अहिंसा और सत्याग्रह के नए प्रतिमानों को गढ़ें। गांधी का दर्शन ही विश्व को सुरक्षित और शांति के रास्ते पर ले जा पाएगा।

महात्मा गांधी ने स्वराज्य की कल्पना जनता को देखकर जनता के लिए ही की। उनका मानना था कि स्वराज्य का सपना तभी पूरा होगा जब हमारी सरकार जनता के निचले तबके की भी हिस्सेदारी का महत्व समझे। उनके लिए जाति, धर्म, ओहदों से भी बढ़कर कोई रहा तो इंसान और इंसानियत रही। उनका राजनीतिक सफर अगर चंपारण के किसानों को लेकर शुरू हुआ तो उनका अंतिम तक सफर सत्य एवं प्रेम की स्थापना के उधेड़बुन में अचानक थम गया। आज देश को महात्मा गांधी की जरूरत है। कुछ हद तक स्वच्छता के महाअभियान में गांधी को प्रतीकात्मक रूप से चश्मों में देखना सुकून पहुंचाता है। ऐसा लगता है कि मानो भारत उनके द्वारा पारिभाषित स्वच्छता को समझेगा और अनुसरण करेगा। महात्मा गांधी ने स्वच्छता को सिर्फ बाहरी कार्य ही नहीं बल्कि आंतरिक दर्शन भी माना। उनके लिए स्वच्छता सत्य के साथ प्रयोग है। इसलिए यह आवश्यक है कि हम स्वच्छता का सही अर्थ समझें और सत्य के साथ चलकर एक तरफ अपने मन को स्वच्छ करें और दूसरी ओर भौगोलिक भारत को। महात्मा गांधी की जरूरत तब और ज्यादा हो जाती है जब इंसान नागरिक से ज्यादा ग्राहक बनने के लिए उतारू है। भूमंडलीकरण के युग में व्यापार, वस्तु, खरीदना-बेचना प्रमुख संज्ञाएं और क्रियाएं हो गई हैं। आज का व्यक्ति अपनी असीमित इच्छाओं की पूर्ति के लिए मनुष्य और प्रकृति दोनों के प्रति आक्रामक दिख रहा है। ऐसी परिस्थिति में मानवीय मूल्यों की जरूरत सबसे ज्यादा आन पड़ी है और महात्मा गांधी की अहमियत तब और भी बढ़ जाती है। मार्क्सवाद, पूंजीवाद, समाजवाद, वामपंथ-दक्षिणपंथ से आगे गांधी के सत्य के साथ प्रयोग ही सबसे बड़ा पंथ है। हो ची मिन्ह ने माना कि ‘मैं और दूसरे लोग क्रांतिकारी होंगे लेकिन हम सभी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से महात्मा गांधी के शिष्य हैं इससे न कम न ज्यादा।’

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