महाराष्ट्र की राजनीति में ‘स्वाभिमान’ की खूब चर्चा होती है। शिवसेना से लेकर बीजेपी तक हर पार्टी अपने-अपने स्वाभिमान का दंभ भरती है। नारायण राणे ने भी अपनी पार्टी का नाम स्वाभिमान से जोड़कर इस परंपरा को आगे बढ़ाया है। उनके होनहार पुत्र इसी नाम से एक संगठन चलाते थे। कालांतर में यह संगठन किसी न किसी कारणों से विवाद में ही रहा है। बेटे के विवादों से घिरे इस संगठन को पिता ने राजनीतिक पार्टी का रूप देने की ठानी है। खैर…! स्वाभिमान का प्रचलित शाब्दिक अर्थ होता है ‘खुद का सम्मान’ लेकिन राज्य की जनता रोज स्वाभिमान का तमाशा देख रही हैं। जनता देख रही है कि राजनीति की देहरी पर आकर स्वाभिमान कैसे अपना अर्थ खोता है। ‘स्वाभिमान’ का रूप धर ‘राजनीतिक अवसरवादिता’ कैसे हास्यास्पद हो जाती है। सत्ता का मोह इस तथाकथित स्वाभिमान की रीढ़ की हड्डी तो तोड़ डालता है। सत्ता के पैरों में लोटने और बेशर्मी से खीसें निपोरने को मजबूर कर देता है।हमारे सामने इसके दो ताजा उदाहरण हैं। पहली है शिवसेना और दूसरे हैं नारायण राणे। शनिवार को शिवसेना की दशहरा रैली में महाराष्ट्र की जनता ने इस तथाकथित स्वाभिमान की धज्जियां उड़ती देखीं। मातोश्री की बैठकों में शिवसेना का स्वाभिमान उफान पर था लेकिन मातोश्री से शिवाजी पार्क पहुंचते-पहुंचते कपूर की तरह फुर्र हो गया। समूचे महाराष्ट्र की जनता जिस ‘स्वाभिमान’ का दर्शन करना चाहती थी, वह लाचार तर्कों के की बानगी में कहीं नजर ही नहीं आया।

पिछले तीन साल से सत्ता के आंगन में स्वाभिमान का यह ड्रामा अब लोगों को बोर करने लगा है। नारायण राणे का हाल तो इससे भी बुरा है। कांग्रेस में थे तो उनका स्वाभिमान बड़ी जोर-जोर से हिलोरे मार रहा था। कांग्रेस पर राणे का सबसे बड़ा आरोप यह था कि कांग्रेस ने उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाया। इसी से उनका स्वाभिमान आहत था। इसी तथाकथित आहत स्वाभिमान के साथ राणे ने कांग्रेस छोड़ने का फैसला किया लेकिन उसके बाद से आहत स्वाभिमान पर मरहम लगाने का एक भी वाकया महाराष्ट्र की जनता को दिखाई नहीं दिया। जनता ने जो कुछ देखा वह बेहद अपमानजनक था। जिस बीजेपी के भरोसे राणे ने अपने आहत स्वाभिमान को संभालना चाहा उसी बीजेपी ने उनके तथाकथित स्वाभिमान को और भी बुरी तरह से तोड़ कर रख दिया। बीजेपी ने न तो राणे को पार्टी में लिया और उनके बेटों के राजनीतिक भविष्य की कोई गारंटी ली। राणे मुंबई-अहमदाबाद-दिल्ली के बीच न घर के न घाट के बनकर चक्कर काटते रहे। राणे का स्वाभिमान जागा या नहीं जागा यह तो वही जाने, परंतु राणे को एक डेशिंग, जुझारू और कर्मठ राजनेता मानने वाले उनके समर्थकों का स्वाभिमान तार-तार होता रहा। ठीक वैसे ही जैसे शिवसेना की दशहरा रैली में जुटे हजारों शिवसैनिकों का स्वाभिमान शनिवार की शाम को तार-तार हुआ होगा। सत्ता का मोह, जब लाचारी बन जाता है तो स्वाभिमान को अपमानित होना ही पड़ता है। वैसे भी स्वाभिमान भीख में या किसी की कृपा से नहीं मिलता, उसके लिए तो संघर्ष करना पड़ता है। स्वाभिमान का संघर्ष आम संघर्षों से अलग होता है। भय और लालच इस संघर्ष के सबसे बड़े शत्रु होते हैं। सत्ता इन्हीं दोनों तत्वों के सहारे स्वाभिमान का मानमर्दन करने का लगातार प्रायस करती है, बीजेपी भी यही कर रही है। जो लोग भय से या लालच से सत्ता के सामने झुक जाते हैं उनका स्वाभिमान कमजोर और बिकाऊ हो जाता है। ऐसे लोगों को स्वाभिमान की बातें करना शोभा नहीं देता। फिर चाहे वह कोई भी क्यों न हो।
तीक्ष्ण-व्यूह
इसे इत्तेफाक ही कहा जा सकता है कि राजनीतिक सौदेबाजी के इस दौर में नारायण राणे ने अपनी जो पार्टी बनाई है इसका संक्षिप्त नाम है एमएसपी… अर्थशास्त्र की भाषा में एमएसपी का मतलब होता है ‘मिनिमम सपॉर्ट प्राइज़’ यानी न्यूनत समर्थन मूल्य। राजनीति में भी समर्थन के मूल्य का अपना अलग अर्थ होता हैं। खासकर तब जब राज्य में अल्पमत की सरकार हो!

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