दो दिन पहले मुस्लिमों ने मोहर्रम का मातम मनाया। पिछले दो दिनों में सोशल मीडिया पर कई ऐसी तस्वीरें दिखीं जिन्होंने मन को बुरी तरह से झकझोर कर रख दिया। एक बच्चा, जिसने अभी अपने 2 सावन भी न देखें होंगे, उसका माथा खून से लथपथ था।

कहीं किसी मासूम को परंपरा के नाम पर अंगारों पर डाला जा रहा था, तो कहीं वे बच्चे अपना खून बहा रहे थे जिन्हें शायद अपना नाम भी ठीक से लिखना न आया हो। लेकिन इन सबके बीच मन में सवाल उठा कि कुछ दिन बाद दिवाली आने वाली है। लोग कहेंगे कि क्यों पैसे में आग लगाते हुए पटाखे जलाओगे, किसी गरीब को कपड़े दिला दो। ये लोग कहते हैं कि महाशिवरात्रि पर क्यों शिवलिंग पर दूध चढ़ाकर उसकी बर्बादी करते हो, किसी भूखे को पिला दो। लेकिन, क्या किसी ने इस बात की मुहिम चलाई कि मोहर्रम पर क्यों खून बहाते हो, किसी ब्लड बैंक में डोनेट कर दो?

मेरा भी यही कहना है कि शिवलिंग पर बहाए जाने वाले दूध को अगर किसी भूखे को पीने के लिए दे दिया जाए, तो ईश्वर को खुश करने का उससे बेहतर तरीका नहीं हो सकता। क्योंकि सनातन परंपरा में नर को नारायण का ही रूप माना गया है। दिवाली पर लाखों रुपए के पटाखे जलाकर अमावस्या की रात में उजाला करने से बेहतर है कि एक ऐसे इंसान के घर में रोशनी दी जाए जिसके घर में हर रात अमावस्या की रात रहती है। इसी आधार पर अगर मोहर्रम पर मातम के नाम पर बहाए जाने वाले खून को दान कर दिया जाए तो किसी की जिंदगी बच सकती है। ‘हाय हुसैन हम ना हुए’ कहते हुए खून बहाने का क्या मतलब है? तब नहीं थे तो यजीद की सेना ने कर्बला में हजरत इमाम हुसैन और 72 लोगों की हत्या कर दी थी, आज हो तो अपने खून को बर्बाद करके क्या कर रहे हो? अपना खून अगर दान करोगे तो किसी खुदा के बंदे को नई जिंदगी मिलेगी। क्या अल्लाह को इस बात से खुशी नहीं होगी कि तुम उसके किसी बंदे को नई जिंदगी दे रहे हो?

आज 1337 साल बीत गए। हर साल मातम के नाम पर लाखों लीटर खून बर्बाद हो जाता है। महाशिवरात्रि पर दूध बर्बाद होने पर ‘विधवा विलाप’ करने वाले कथित प्रगतिवादी लोग खून की बर्बादी पर खामोश क्यों हो जाते हैं? सच को बचाने के लिए, सच का साथ देने के लिए हुसैन के खेमे के सभी 72 लोगों ने अपनी जान दे दी थी। वह इस्लाम की ताकत थी। वह ताकत थी उस इस्लाम की जिसे पता था कि मानवता सर्वोपरि है। वह इस्लाम जिसमें मानवता की रक्षा के लिए इस्लाम के तत्कालीन जीवित प्रतिनिधि से मोहब्बत करने वालों ने अपनी जान देने से भी परहेज नहीं किया। उसी ताकत को देखते हुए महात्मा गांधी ने कहा था, ‘अगर मेरे पास हुसैन के 72 सिपाहियों जैसी सेना होती तो मैं 24 घंटे में भारत को आजादी दिला देता।’
आज लोग खुद को यातनाएं देते हैं। सिर्फ इसलिए ताकि वह, हुसैन और उनके खेमे के लोगों पर हुई यातना को महसूस कर सकें। इसके पीछे तर्क है कि जब आपको दर्द का अंदाजा होगा, तो ही दिल में दर्दमंदी पैदा होगी। तर्क तो ठीक है लेकिन सवाल यह है कि इस दर्द को महसूस करने का कोई मानवीय लाभ है? क्या इसका तरीका कुछ ऐसा नहीं हो सकता, जिससे मानव जाति का, खुदा के बंदों का, उनका जो हुसैन से आज भी मोहब्बत करते हैं, कुछ लाभ हो?

खून निकालना है तो उस खून को किसी की जान बचाने के लिए लगाओ। खुद को मानवता की रक्षा और क्रूरता के खिलाफ मजबूत करना है तो यूं खुद का और मासूम बच्चों का खून बहाकर नहीं बल्कि उनके दर्द को महसूस करने की कोशिश करो, जिनका बेटा अपने 26वें जन्मदिन से 1 दिन पहले इस्लाम के नाम पर लड़ाई लड़ने वालों की क्रूरता की भेंट चढ़ गया। दर्द महसूस करना है तो उस नवविवाहित महिला का करो, जिसका पति शादी के 12 दिन बाद शहीद हो गया। दर्द महसूस करना है तो उस बेटे का करो, जिसके जन्म लेते ही उसका पिता एक आतंकी हमले में मारा जाता है। दर्द महसूस करना है तो आंखों से कमजोर हो चुके उस पिता का करो, जिसके बेटे ने वादा किया था कि इस बार आर्मी से छुट्टी लेकर जब वह घर वापस आएगा तो नया चश्मा बनवाकर देगा, लेकिन वापस आई तो उसकी लाश…

इन लोगों को दर्द कौन दे रहा है? इन लोगों को दर्द क्यों दिया जा रहा है? इन लोगों को दर्द देने वाले लोग इस्लाम के नाम पर क्रूरता फैलाते हैं। मानवता बचानी है तो मुस्लिमों को अपने बच्चों को शिक्षित करना होगा, उन्हें ‘कठमुल्लों’ को इस्लाम सिखाने से पहले कंप्यूटर सिखाना होगा। उन बच्चों को बेवजह खून बहाना सिखाने से बेहतर है, यह बताओ कि खून की अहमियत क्या है।

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