स्मोकिंग, मोटापा आदि से सेहत को होने वाले नुकसान के बारे में लोग अकसर बात करते हैं। लेकिन, एक गंभीर परिस्थिति है जो इन सबसे ज्यादा खतरनाक है और उसपर कोई चर्चा भी नहीं होती है। वह है ‘अकेलापन’. इससे पहले इंसान इतना अकेला कभी नहीं था, जितना अब है। भले ही वह भीड़भाड़ वाले बंद शहरों में रहता हो, या जेब में पड़े उसके फोन में कितने ही दोस्तों के कॉन्टैक्ट्स क्यों न हों। वाइस एडमिरल विवेक एच. मूर्ति बताते हैं कि यह लोगों की आयु और प्रॉडक्टिविटी पर भी असर डालती है। मूर्ति इस साल अप्रैल तक यूएसए के सर्जन जनरल रहे हैं।

मूर्ति बताते हैं कि दफ्तरों में कर्मचारी और आधे से ज्यादा सीईओ अकेला महसूस करते हैं। जिन लोगों के करीबी दोस्त होते हैं, उनकी संख्या लगातार घट रही है। अकेलापन हमेशा अकेले होने को ही नहीं कहते। हो सकता है कि आपके आसपास कई लोग हों, लेकिन फिर भी आप खुद को अकेला महसूस करें, तो आप अकेलेपन का शिकार हैं।

यह खतरनाक क्यों है?
कई सालों में हमारे दिमाग में सोशल कनेक्शन की जरूरत पैठ बना चुकी है। इस तरह की सुरक्षा की भावना की कमी से स्ट्रेस होता है। इससे कॉर्टिसॉल हॉर्मोन की मात्रा बढ़ जाती है और शरीर में सूजन आ जाती है। इससे हार्ट डिजीज, डिप्रेशन और मोटापा का भी खतरा बढ़ता है। शारीरिक नुकसान के अलावा, इससे फैसले लेने की क्षमता, प्लानिंग और भावनात्मक नियंत्रण पर भी असर पड़ता है।

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