बहुचर्चित आरुषि-हेमराज हत्याकांड में गुरुवार को तब एक और मोड़ आया जब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने राजेश तलवार और नूपुर तलवार को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। 25 नवंबर 2013 को विशेष सीबीआई अदालत ने इन दोनों को हत्या का दोषी करार देते हुए आजीवन कैद की सजा सुनाई थी। शुरू से ही विचित्र मोड़ों के लिए चर्चित इस मामले में तीन-तीन जांचों के बावजूद बुनियादी सवालों के जवाब आज तक नहीं मिले हैं। सच पूछा जाए तो तलवार दंपती को न तो सजा देने का कोई पुख्ता सबूत था, न ही उन्हें निर्दोष मानने का कोई ठोस आधार है। उनकी रिहाई सिर्फ न्यायशास्त्र के इस मूल सिद्धांत के तहत हुई है कि सौ अपराधी भले छूट जाएं पर एक भी निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चाहिए। इस लिहाज से हाई कोर्ट को इस मामले में इतने सबूत नहीं मिले कि दोनों को साफ तौर पर अपनी बेटी और घरेलू नौकर की हत्या का दोषी माना जा सके।

इस मामले में अगर कोई एक पक्ष ऐसा है, जिसे कठघरे में खड़ा करके कड़ी सजा मिलने तक मुकदमा चलाया जाना चाहिए तो वह है नोएडा पुलिस। घटना के ठीक बाद से लेकर मामला सीबीआई को सौंपे जाने तक उसने जितने गैरपेशेवर ढंग से इस केस को हैंडल किया, उसका जोड़ दुनिया में कहीं और मिलना मुश्किल है। हत्या की सूचना मिलने के बाद घटनास्थल पर पहुंची पुलिस टीम मकान का ठीक से मुआयना तक नहीं कर सकी। उसे भनक भी नहीं लगी कि उसी घर में एक और लाश पड़ी हुई है। इतना ही नहीं, पुलिस के बड़े अधिकारी मीडिया को जिस तरह से ब्रीफ करते रहे, वाइफ स्वैपिंग से लेकर हेमराज और आरुषि के शारीरिक संबंधों की कहानियां प्लांट करते रहे, वह अपने आप में आपराधिक मानसिकता का उदाहरण है। बाद में सीबीआई भी कोई अलग उदाहरण नहीं पेश कर सकी। उसकी दो टीमों ने अलग-अलग मामले की जांच की लेकिन नतीजा सिफर ही रहा। कुल मिलाकर यह मामला हमारी अभियोजन संस्थाओं की घनघोर विफलता का जिंदा दस्तावेज बन कर रह गया है। इस घटना का सबसे दुखद और शर्मनाक पहलू यह है कि इस विफलता को सुनिश्चित करने वाले कई पुलिस अधिकारी आज भी कहीं न कहीं इसी सिस्टम के अंदर बैठे इसे और ज्यादा सड़ाने का काम कर रहे होंगे।

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