हाल के कुछ साल अभिव्यक्ति की आजादी के लिए बेहतर नहीं कहे जा सकते। इस दौरान उन लेखकों, प्रोफेसरों और पत्रकारों की हत्याएं तक हुई हैं, जिनकी आवाज का सुर और कलम की स्याही सत्ता से मेल नहीं खाते थे। भारत में धार्मिक असहिष्णुता को लेकर दुनिया के बड़े नेताओं ने भी सवाल उठाए। पिछले दिनों पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या के बाद जरूरी हो गया कि हम कहने-लिखने की आजादी पर बात करें। इस कॉलम में इस बार लेखक और संपादक पंकज बिष्ट बता रहे हैं कि हिंसा अभिव्यक्ति को किसी हाल दबा नहीं सकती।
भारतीय संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के महत्व को, जिस तरह से रेखांकित किया गया है, उसे कुछ देर को छोड़ भी दें तो भी सर्वकालिक सत्य यह है कि मानव के विकास का आधार ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। विचारों का विकास ज्ञान का विकास है। यह विकास विचारों की टकराहट से ही संभव हुआ है, जो व्यवस्था- चाहे राजनीतिक हो, धार्मिक हो या विचारधारात्मक- इस मूल्य में विश्वास नहीं रखती, वह अपने समाज और आनेवाली पीढ़ियों के भविष्य को ही सूली चढ़ाने का काम करती है। यूरोप को देखिए, जिसने सबसे पहले और लगातार धर्म को चुनौती दी, परंपराओं को तोड़ा और दुनिया को, मात्र ताकत के बल पर नहीं, बल्कि ज्ञान के बल पर जीता और आज भी उस पर प्रभुत्व बनाए है।

दूसरी ओर भारतीय समाज को लें। ज्यों-ज्यों यह समाज संवृत्त होता गया, एक महान सभ्यता पतन की ओर बढ़ती गई। उसका विकास ही नहीं रुका, बल्कि यह अपनी परंपराओं और मूल्यों को भी नहीं बचा पाई। अगर आधुनिक भारत का विकास हुआ है तो इसलिए नहीं कि हम अपनी ठहरी हुई परंपराओं और मूल्यों को पुनर्स्थापित करने में सफल हो गए, बल्कि हमारे नेताओं ने हमारी जड़ परंपराओं को तोड़ा, उन्हें नकारा। 19वीं सदी के बाद का भारत का इतिहास इन परंपराओं से मुक्त होने का इतिहास है। महत्वपूर्ण यह है कि हमने नये मूल्यों और परिवर्तनों को तेजी से अपनाया। यह भी सत्य है कि ये मूल्य पश्चिम से आए थे, जहां पुनर्जागरण हो चुका था, ज्ञान की दुनिया में उथल-पुथल हो रही थी, बल्कि ज्ञान का विस्फोट हो रहा था, और औद्योगिक क्रांति नित नये डग भर रही थी। वह धर्म, जो तब तक सारी दुनिया का नियंता रहा था, अपनी प्रासंगिकता खोता जा रहा था। राजा राम मोहन राय से लेकर मोहनदास कर्मचंद गांधी और भगत सिंह तक के हमारे नेताओं में शायद ही कोई अपवाद हो जो कि पश्चिम में हो रहे विकास और उसके ज्ञान से प्रभावित न रहा हो। दूसरे शब्दों में कहें तो यदि हमारे संविधान निर्माताओं ने समानता, धर्मनिरपेक्षता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे मूल्यों का ध्यान नहीं रखा होता तो हम भी तीसरी दुनिया के अधिसंख्य देशों की तरह सामाजिक-आर्थिक ठहराव, अशांति, तानाशाही और आंतरिक टकराव को भुगत रहे होते।

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