कोई काम मुल्क में बिना लफड़े-झगड़े के हो जाये, तो टीवी चैनल बुरा मान जाते हैं कि हाय हमारी रिपोर्ट, हमारी टीआरपी का क्या होगा। आशीष नेहरा बहुत इज्जत के साथ रिटायर हुए। वह दिल्ली के फिरोजशाह कोटला ग्राउंड पर आखिरी मैच में बतौर खिलाड़ी मौजूद रहे। फिर सवाल उठे कि ऐसा ही इज्जतदार रिटायरमेंट वीरेंद्र सहवाग को भी मिलना चाहिए था। यूं खिलाड़ी आमतौर पर सब्रदार होते हैं, ज्यादा मार नहीं मचाते।

सुनील गावस्कर तब के सुपर बल्लेबाज हैं, जब विराट कोहली पैदा भी न हुए थे। पर सुनील गावस्कर मैदान के एक कोने से कमेंट्री करके खुश रहते हैं, यह ना कहते कि मैं पुराना बल्लेबाज, मुझे मौका मिलना चाहिए बैटिंग का भी, कप्तानी का भी। ऐसा सब्र नेता नहीं दिखा पाते, यशवंत सिन्हा कह ही जाते हैं कि मैं पुराना नेता, पुराना वित्तमंत्री फिर भी अरुण जेटली को वित्तमंत्री क्यों बना दिया गया।
खिलाड़ी सब्र का भाव रखते हैं कि अपना वक्त था। अब नहीं है। नेता हर वक्त को सिर्फ और खालिस अपना ही वक्त मानता है।
धोनी सब्र रखते हैं कि उनके सामने आया बल्लेबाज विराट कोहली ज्यादा इश्तिहारों में मॉडलिंग कर रहा है, उन्हें कम में मॉडलिंग करने का मौका मिल रहा है। धोनी नहीं कहते कि मुझसे भी उन बाइकों का इश्तिहार कराओ, जिन पर अब विराट कोहली चलते हुए दिखायी देते हैं। कपिल देव 1983 में जीते गये वर्ल्ड कप के किस्से ही सुनाते हैं, कभी ऐसे बयान जारी न करते कि बैटिंग का तजुर्बा उनके पास हार्दिक पांड्या से ज्यादा है, फिर भी मौके अब हार्दिक को मिल रहे हैं।

मुल्क को ऐसे सब्र की जरूरत है। सुनील गावस्कर जैसा सब्र साहित्य में दिखने लगे, तो बहुत झगड़े खत्म हो लेंगे। जो कवि अभी सत्तर के पास हैं, उन्हें युवा कवि न कहो, तो बुरा मान जाते हैं। चालीस का कवि फ्रस्टेट होता है कि अगर सत्तर का युवा है, तो वह तो अभी लॉलीपॉप पर टहलनेवाली उम्र का है। सुनील गावस्कर की गेम स्पिरिट की जरूरत पॉलिटिक्स और साहित्य में समान रूप से है।

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