उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने धर्मनिरपेक्षता के नाम पर जारी पाखंड पर जो प्रहार किया उस पर हैरान-परेशान होने की जरूरत नहीं, बल्कि गंभीरता से विचार-विमर्श करने की आवश्यकता है। यह आवश्यकता इसलिए है, क्योंकि इस देश को धर्मनिरपेक्षता रूपी विकृति ने बहुत अधिक हानि पहुंचाई है। एक ऐसे देश में जो सर्वधर्म समभाव से प्रेरित और संचालित हो और जिसने वसुधैव कुटुंबकम को अपना आदर्श बना रखा हो वहां सेक्युलरिज्म की अवधारणा की कहीं कोई जरूरत ही नहीं थी। सेक्युलरिज्म शुद्ध रूप से विजातीय अवधारणा है जिसका भारत से कहीं कोई लेना-देना नहीं। यूरोप में सेक्युलरिज्म की अïवधारणा इसलिए पनपी, क्योंकि नागरिक सत्ता को चर्च के दुष्प्रभाव से बचाने की आवश्यकता थी। भारत में ऐसा कुछ था ही नहीं, लेकिन दुर्भाग्य से इसके बावजूद सेक्युलरिज्म को एक आदर्श के रूप में अपनाने का काम किया गया। इससे भी खराब बात यह हुई कि सेक्युलरिज्म को धर्मनिरपेक्षता का पर्याय समझा गया। चूंकि धर्म का अर्थ कर्तव्य है इसलिए उस पर प्रश्न खड़े करने की कहीं कोई आवश्यकता नहीं थी। सेक्युलरिज्म को पंथनिरपेक्षता के रूप में लिया जाना चाहिए था, लेकिन उसे धर्मनिरपेक्षता समझ लिया गया और इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि मानवमात्र के लिए जो आदर्श कर्तव्य हैं उनकी अनदेखी हुई। हालांकि भारत सेक्युलरिज्म की विकृतियों से अच्छी तरह दो-चार हो चुका है, लेकिन उन पर इसलिए कहीं कोई चर्चा नहीं होती, क्योंकि इस विजातीय अवधारणा को श्रेष्ठ मानना एक चलन बन गया है। भारत जब तक इस चलन से मुक्त नहीं होता तब तक सर्वधर्म समभाव की अवधारणा को आगे बढ़ाना मुश्किल होगा।
इसमें कहीं कोई संशय नहीं कि धर्मनिरपेक्षता रूपी सेक्युलरिज्म के नाम पर अल्पसंख्यकवाद को बढ़ावा देने का काम किया गया है। अल्पसंख्यकवाद की राजनीति ने सामाजिक ताने-बाने को जैसा नुकसान पहुंचाया है उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है। गलती केवल यही नहीं हुई कि सेक्युलरिज्म के नाम पर एक विजातीय अवधारणा को भारतीय समाज पर थोप दिया गया, बल्कि यह भी हुई कि एक ओर तो यह कहा गया कि भारतीय संविधान की दृष्टि में सभी नागरिक बराबर हैं और इसके साथ ही यह भी व्यवस्था की गई कि भिन्न उपासना पद्धति वाले लोगों को कुछ विशेष अधिकार प्राप्त होंगे। इन विशेष अधिकारों का न केवल जमकर दुरुपयोग किया गया, बल्कि उनके जरिये वोट बैंक की राजनीति को भी प्रश्रय दिया गया। यह राजनीति इतनी अधिक फली-फूली कि ङ्क्षहदू धर्म के सहोदर-सहभागी समझे जाने वाले जैन धर्म के अनुयायियों ने स्वयं को अल्पसंख्यक समुदाय घोषित करने की मांग की। चंूकि राजनीतिक संकीर्णता का बोलबाला था इसलिए इस मांग को स्वीकार भी कर लिया गया। अच्छा हो कि देश के नीति-नियंता और विचारक इस पर चिंतन-मनन करें कि सेक्युलरिज्म ने देश का भला किया है अथवा समाज में विभेद करने का काम किया है। बेहतर होगा कि धर्म के मर्म को समझने की कोशिश की जाए, न कि विभिन्न उपासना पद्धतियों के कर्मकांडों को धर्म का पर्याय माना जाए। यह उपासना पद्धति के कर्मकांडों को धर्म के रूप में लिए जाने का ही दुष्परिणाम है कि कर्मकांड को ही धर्म समझ लिया गया है और इसी कारण कर्मकांड रूपी कथित धार्मिक क्रियाकलाप एक तरह के शक्ति प्रदर्शन में परिवर्तित हो रहे हैं।

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