धर्म सदाचार और नैतिक मूल्यों के प्रति हमें आग्रही बनाता है। धर्म पर व्यक्ति और समाज का जीवन टिका है। धर्म को उपासना पद्धति, मत-मजहब के साथ नहीं जोड़ सकते। धर्म एक ही है। आप उसे मानव धर्म कह सकते हैं या व्यापक रूप देना है तो वह सनातन धर्म है। बाकी धर्म नहीं, मत-मजहब या संप्रदाय हैं। वे धर्म की श्रेणी में नहीं आते। धर्म के साथ व्यापक धारणात्मक व्यवस्था जोड़िए। धर्मनिरपेक्ष शब्द ने इस देश को अपूरणीय क्षति पहुंचाई है। धर्मनिरपेक्षता शब्द आजादी के बाद का सबसे बड़ा झूठ है। व्यवस्था जब किसी मत, मजहब या संप्रदाय के प्रति आग्रही न होकर सर्वपंथ समभाव के साथ आगे बढ़ेगी तभी आदर्श होगी। धर्म कर्तव्य, सदाचार और नैतिक मूल्यों का पर्याय है। अगर किसी व्यवस्था को इस सबसे निरपेक्ष करेंगे तो फिर वह अकर्मण्य ही होगी। सदाचार से निरपेक्ष व्यवस्था क्या होगी, दुराचार की होगी। नैतिक मूल्यों से निरपेक्ष व्यवस्था क्या होगी, पापाचार होगी। ब्रह्मांड में चर और अचर जो भी है उसका अपना धर्म है। वायु अपने धर्म का निर्वाह नहीं करेगी और जल अपने धर्म का निर्वाह नहीं करेगा तो क्या व्यवस्था संचालित हो पाएगी? सबकी अपनी उपासना पद्धति है। हम किसी पर अपनी आस्था नहीं थोप सकते। मैं तिलक लगाता हूं, बहुत लोगों को यह अच्छा नहीं लगता होगा, बहुत लोगों को अच्छा भी लगता होगा, लेकिन मैं कहता हूं कि इस कर्मकांड का वैज्ञानिक आधार है और मैं इसीलिए तिलक धारण करता हूं। हमारे शरीर को संतुलित करने वाली तीन प्रमुख नाड़ियां इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना, इन तीनों के मिलन स्थल-कपाल पर तिलक लगता है। विपरीत तत्वों के मिलन का जो स्थल होता है वहां ऊर्जा उत्पन्न होती है। उस ऊर्जा का उपयोग सही कर सकें, अंत:करण की ओर प्रेरित कर उसका उपयोग लोककल्याण के लिए कर सकें, आध्यात्मिक ऊर्जा का उपयोग आध्यात्मिक उन्नयन के लिए कर सकें, इसलिए हम तिलक धारण करते हैं। वह सौंदर्य का प्रतीक न होकर हमारी आध्यात्मिक ऊर्जा और कर्मकांड से जुड़ा है। इसे पोंगापंथ नहीं मान सकते। हां, उसके नाम पर चल रही जो रूढ़िवादिता है और कर्मकांड के नाम पर जो पाखंड है उसे रोका जाना चाहिए। हम घर में तुलसी का पौधा लगाते हैं। तुलसी का पौधा लगाना पाखंड नहीं। आजकल डेंगू का प्रकोप है पर जो तुलसी का काढ़ा रोज पिएगा, वह डेंगू से बचा रहेगा। बहुत सारे लोगों को तुलसी पर आपत्ति होगी। सिर पर चोटी रखते हैैं, उस पर भी आपत्ति होगी, लेकिन यह पाखंड नहीं। यह सनातन धर्म परंपरा का वैज्ञानिक आधार है। हम रक्षासूत्र क्यों बांधते हैं हाथ में? रक्षासूत्र पाखंड का प्रतीक नहीं। आयुर्वेद में वात, पित्त और कफ प्रमुख हैं। वैद्य सबसे पहले इन तीनों का संतुलन ही देखते हैैं। इन तीनों के संतुलन का आधार है रक्षा सूत्र। बहुत से लोग उसे दूसरे तरीके से बांधते हैं। यह तो बुद्धि का अंतर है।

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