सऊदी अरब इन दिनों व्यापक बदलाव के दौर से गुजर रहा है। इससे पहले कि हम यह पड़ताल शुरू करें कि इस बदलाव का भारत के सामरिक हितों पर क्या प्रभाव पड़ेगा, हमें यह देखना होगा कि आखिर इस राजशाही में क्या चल रहा है, जिसे इस्लाम की संरक्षक और वहाबी इस्लाम की धुरी माना जाता है। सऊदी अरब के मौजूदा शासक सलमान सऊदी राजशाही के संस्थापक अब्दुल अजीज बिन सऊद के सबसे छोटे बेटे हैं। सऊद ने 1932 से 1953 के बीच शासन किया। सऊदी शाही परिवार और वहाबी धर्मगुरुओं के बीच असहज सा शक्ति संतुलन रहा है। सऊदी धार्मिक गुरुओं द्वारा सुन्नी इस्लाम की वहाबी धारा को पोषित किया जा रहा है जिसे कट्टर माना जाता है। यह रूढ़िवादी धारा पुराने तौर-तरीकों को अपनाकर इस्लाम को सातवीं सदी वाले दौर में ले जाने पर आमादा है। वहाबी धारा के व्यापक प्रसार में मददगार बनने की धर्मगुरुओं की मांग पर राजशाही ने सहमति तो जताई है, लेकिन बदले में उसकी भी यह मांग है कि देश के राजनीतिक एवं वित्तीय प्रबंधन में धर्मगुरु कम से कम दखल दें। सऊदी अरब पश्चिम एशिया का एक महत्वपूर्ण देश है और ऐसा केवल इसलिए नहीं कि यहां मुसलमानों के प्रमुख धार्मिक स्थल हैं, बल्कि इसलिए भी कि तेल की मेहरबानी से उसकी हैसियत काफी ऊंची है। यह हैसियत इस समय कुछ डांवाडोल है, क्योंकि एक तो अभी तेल की कीमतें बहुत ऊंचे स्तर पर नहीं हैं और दूसरे अमेरिका के ऊर्जा हित भी बदल रहे हैं। सऊदी अरब को 1979 से ईरान से तगड़ी चुनौती मिल रही है जहां शिया विचारधारा का वर्चस्व है और जिसका वहाबियों के साथ 36 का आंकड़ा है। पश्चिम एशिया का सामरिक माहौल मुख्य रूप से दो संघर्ष बिंदुओं पर टिका हुआ है। एक तो अरब-इजरायल संघर्ष जिसमें तल्खी कम हो रही है और दूसरे, शिया-सुन्नी विवाद जो समय के साथ और बढ़ता जा रहा है। आइएस की हालिया पराजय और सीरियाई गृहयुद्ध में ईरान-रूस-सीरिया की तिकड़ी के दबदबे ने ईरान के लिए रणनीतिक लाभ की राह खोली है। इसे अमेरिका, इजरायल और सऊदी अरब अपने लिए खतरनाक मान रहे हैं। भले ही आइएस का सैन्यशक्ति से दमन कर दिया गया हो, लेकिन जैसे अल कायदा खत्म नहीं हुआ, वैसे ही आइएस का वजूद भी बचा हुआ है।
सऊदी अरब में किंग सलमान के बेटे मोहम्मद बिन सलमान एमबीएस के उपनाम से मशहूर हैं। उन्होंने 32 साल की उम्र में क्राउन प्रिंस यानी शहजादे की गद्दी हथिया ली। उनका उदय इस बात का संकेत है कि वह सऊदी अरब को ‘पोस्ट एनर्जी एरा’ के लिए तैयार कर रहे हैं। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती पुरानी भ्रष्ट व्यवस्था को तिलांजलि देने की है जिसमें राजाज्ञा ही कानून है और धर्मसंस्था का लक्ष्य उस कट्टर वहाबी विचारधारा का विस्तार करना है जिसे वैश्विक स्तर पर इस्लामी चरमपंथ के बढ़ने की बड़ी वजह माना जाता है। हालांकि ईरान को जवाब देने के लिए यमन के साथ छेड़ी गई विध्वंसक लड़ाई अब खुद सऊदी अरब के लिए आत्मघाती साबित हो रही है। इस बीच एमबीएस ने शाही परिवार के प्रमुख सदस्यों और उनके खासमखास लोगों की नजरबंदी और गिरफ्तारी के साथ ही तकरीबन एक लाख से भी ज्यादा ताकतवर नेशनल गार्ड पर अपनी पकड़ और मजबूत बनाई है। पुरानी और नई व्यवस्था में संघर्ष इस कदर हावी है कि अनिश्चितता की स्थिति कायम हो गई है। ऐसी संभावनाएं कम ही हैं कि पुरानी व्यवस्था नई व्यवस्था के लिए आसानी से राह बनने देगी, लिहाजा इस्लाम का प्रमुख गढ़ आने वाले दिनों में अस्थिरता का शिकार हो सकता है।
तमाम कारणों से सऊदी अरब और पश्चिम एशिया का भारत के लिए बहुत सामरिक-रणनीतिक महत्व है। भारत की ऊर्जा सुरक्षा में उसकी बड़ी अहमियत है, क्योंकि इराक को पछाड़कर सऊदी भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बन गया है। अस्थिरता और असंतोष कभी भी अच्छी खबरें नहीं लाता और खासतौर से तब तो बिल्कुल भी नहीं जब भारत अपनी अर्थव्यवस्था को तेजी देने की हरसंभव कोशिश कर रहा है। जामनगर और पश्चिमी तट पर प्रस्तावित कुछ बड़ी रिफाइनरियों के लिए भारत को बड़ी मात्रा में कच्चे तेल की दरकार होगी। इसके लिए सऊदी अरब ही मुख्य आपूर्तिकर्ता है, क्योंकि परमाणु सौदे को लेकर ईरान पर लटकती तलवार से उसकी तेल की धार पता नहीं कब कमजोर पड़ जाए। पश्चिमी एशिया और खासतौर से सऊदी अरब में भारतीय बड़ी संख्या में कार्यरत हैैं। इस क्षेत्र में कार्यरत करीब 80 लाख भारतीयों में से अकेले 28 लाख तो सऊदी में ही हैं जो भारत में हर साल तकरीबन 35 अरब डॉलर भेजते हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए यकीनन यह बहुत बड़ा योगदान है। राजनीतिक अस्थिरता अर्थव्यवस्था को कमजोर करती है। परिणामस्वरूप नौकरियों पर संकट खड़ा होता है। अगर अस्थिरता एक निश्चित स्तर से ज्यादा बढ़ती है तो फिर भारतीयों को वहां से निकालने के अलावा और कोई चारा नहीं होगा जैसा 2015 में यमन में किया गया था। इतने बड़े पैमाने पर लोगों के रोजगार खत्म होने से लाखों परिवार संकट में आ जाएंगे और भारत में भी इसके खतरनाक सामाजिक प्रभाव महसूस किए जाएंगे। तीसरा पहलू यह है कि अभी तक यह भी नहीं मालूम कि एमबीएस का राजनीतिक झुकाव किस ओर है। अगर सऊदी अरब को अपना पुननिर्माण करना है तो उसमें उसे भारत की निष्पक्ष भागीदारी की जरूरत होगी। यह पाकिस्तान की कीमत पर ही होगा जिसका जिया उल हक के समय से ही दबदबा रहा है। इससे उस अस्पष्ट तंत्र और नियंत्रण पर भी विराम लगेगा जिसे पाकिस्तानी इंटेलिजेंस भुनाते आया है। चौथा पहलू केवल भारत ही नहीं पूरी अंतरराष्ट्रीय बिरादरी से जुड़ा है कि अगर नई व्यवस्था में आइएस जैसी ताकतों को प्रश्रय मिला तो यह पूरी दुनिया के लिए विध्वंसक होगा। नेशनल गार्ड पर सऊदी धर्मगुरुओं की पकड़ आइएस के लिए आमंत्रण का सबब बन सकती है। यह भारत के लिए खतरनाक स्थिति होगी।
अपने हितों की पूर्ति के लिए भारत को संतुलन साधन होगा। अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक अपनी पहुंच और व्यापार को सुगम बनाने के लिए महत्वपूर्ण चाबहार बंदरगाह के लिए उसे ईरान और वहां के शिया तंत्र से भी दोस्ताना रवैया जारी रखना होगा। इसकी उपयोगिता भी साबित होने लगी है। कांडला बंदरगाह से गेहूं की खेप चाबहार भेजी गई और फिर उसे अफगानिस्तान पहुंचाया गया। एमबीएस को भारत के समर्थन के लिए अमेरिका और इजरायल की ओर से भी कुछ दबाव पड़ सकता है। और अंत में भारत की नीति को लेकर भी पारदर्शिता की दरकार है, क्योंकि अफवाहों से भारत में लोगों की भावनाएं आहत हो रही हैं। एक तो अधकचरी जानकारी से लैस शिया समुदाय मांग कर रहा है कि आइएस के तगड़े उभार से पहले कर्बला की हिफाजत के लिए स्वयंसेवकों की एक टुकड़ी तैनात की जाए। भारत को उम्मीद करनी चाहिए कि सऊदी में संक्रमण का यह दौर लंबा न चले।

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