उच्चतम न्यायालय ने जनहित याचिकाओं यानी पीआइएल के दुरुपयोग पर तल्ख टिप्पणी करते हुए एक याचिकाकर्ता पर एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है। न्यायाधीश पहले भी इस पर अनेक बार पर चिंता व्यक्त कर चुके हैं और इस बारे में विस्तृत नियम भी हैं, फिर भी पीआइएल का दुरुपयोग क्यों नहीं रुक पा रहा है? संविधान के अनुसार संसद को कानून बनाने, सरकार को रोजमर्रा के काम करने और अदालतों को न्याय देने का कार्य-विभाजन किया गया है। सरकार और संसद की विफलताओं की चर्चा आम है, परंतु अदालतों के सुस्त रवैये से त्रस्त करोड़ों परिवार के दर्द पर शायद ही कभी चर्चा होती हो? उच्चतम न्यायालय ने न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए बनाए गए न्यायिक आयोग को रद कर दिया, लेकिन कॉलेजियम व्यवस्था में सुधार और भ्रष्टाचार रोकने के लिए कोई न्यायिक पहल नहीं हुई। जनता को जल्द न्याय के मौलिक अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए अदालतों को अपना घर ठीक करने की जरूरत है। इस मोर्चे को दुरुस्त किए जाने के बजाय पीआइएल के माध्यम से अदालतों द्वारा ‘वाचडॉग’ बनने की बढ़ती प्रवृत्ति देश के लिए घातक है। फिर यह किसी विषय विशेष तक ही सीमित भी नहीं है। पर्यावरण और प्रदूषण का ही उदाहरण लें। यदि प्रदूषण पर लगाम लगाने के लिए अदालती सख्ती के चलते निवेशक देश में निवेश करने से ही कतराने लगें तो फिर ईज ऑफ डूइंग बिजनेस और मूडी द्वारा ग्रेडिंग सुधार का अर्थव्यवस्था को कैसे लाभ मिलेगा? तमाम अन्य कारणों से प्रदूषण बढ़ रहा है जिसे सरकारी समस्या मानकर अदालती आदेशों से कैसे ठीक किया जा सकता है? इसी तरह से गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और अपराध जैसे देशव्यापी मर्ज पीआइएल के जादुई मंत्र से कैसे दूर हो सकते हैं? यदि पीआइएल ही प्रत्येक मर्ज की दवा है तो फिर अदालतें यह सपाट आदेश पारित कर दें कि अब सभी नेता और अधिकारी ईमानदारी से कानून के अनुसार काम करेंगे।

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