अल्मोड़ा, भूगर्भीय लिहाज से नाजुक उत्तराखंड में असंख्य थ्रस्ट (भ्रंश) व फॉल्ट्स सक्रिय हैं। इनकी लगातार सक्रियता के कारण भूकंपीय हलचल स्वाभाविक तौर पर बढ़ने लगी है। यही कारण है कि पिछले कुछ वर्षों से भूकंप का केंद्र उत्तराखंड ही बन रहा है। चूंकि धरती के भीतर जमा ऊर्जा अरसे से बाहर नहीं निकली है, लिहाजा मेन सेंट्रल थ्रस्ट पर बैठे मुनस्यारी क्षेत्र के लिए स्थिति खतरनाक है। यदि भूकंप की गहराई 20 किमी से ऊपर होती तो पर्वतीय प्रदेश में तबाही निश्चित थी। इन झटकों के बाद अभी आफ्टर शॉक भी आएंगे, हालांकि वह इतने बड़े नहीं होते।

वरिष्ठ भूगर्भ वैज्ञानिक प्रो. बहादुर सिंह कोटलिया के मुताबिक हिमालयी क्षेत्र में लंबे समय से धरती के भीतर जमा ऊर्जा बाहर नहीं निकली है। ये ऊर्जा इन्हीं फॉल्ट्स के साथ भूकंप के रूप में बाहर निकलती है। भूवैज्ञानिक कारणों चलते ही उत्तराखंड में थ्रस्ट व फॉल्ट्स अब पहले से कहीं ज्यादा सक्रिय रहने लगे हैं।

बुधवार की सायं 8.51 व 8:53 बजे पूरे हिमालयी राज्य में 5.5 व 4.2 तीव्रता के साथ दो बार धरती डोली। प्रो. कोटलिया आगाह करते हैं कि इन हालात में मेन सेंट्रल थ्रस्ट पर बसे मुनस्यारी (पिथौरागढ़) के लिए आने वाले दौर में स्थिति खतरनाक हो सकती है। यह भी चेताते हैं कि यदि धरती में गहराई 20 किमी से ऊपर होती तो परिणाम घातक होते। आगे सतर्क रहने की जरूरत है।

प्रो. कोटलिया की मानें तो साउथ अल्मोड़ा थ्रस्ट को असक्रिय एरिया माना जाता रहा है। मगर सुयालबाड़ी (नैनीताल) से कालामुनि (मुनस्यारी) तक इसकी सक्रियता ने भविष्य के लिए खतरे के संकेत भी दिए हैं।

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