नई दिल्‍ली [स्‍पेशल]। हमारे देश की न्‍याय प्रणाली ऐसी हो चुकी है कि यहां पर क्रिमीनल अपील 40 वर्षों में भी फैसला नहीं हो पाता है। हद तो तब हो जाती है जब मामला हाईकोर्ट का होता है। आपको जानकर हैरत होगी, लेकिन यह एक दर्दनाक सच्‍चाई है जिसका खुलासा सुप्रीम कोर्ट में दायर एक रिपोर्ट में किया गया है। दरअसल यह मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट से जुड़ा है जहां 1970 की शुरुआत में दायर की गई एक क्रिमीनल अपील को आज तक डिसाइड नहीं किया जा सका है। लिहाजा यह अपील आज तक भी फैसले के लिए लंबित है। यह हाल तब है जब सुप्रीम कोर्ट अपने एक आदेश में यहां तक कह चुका है कि क्रिमीनल केस के सभी आरोपियों का यह मौलिक अधिकार है कि वह अपने मामले की त्‍वरित सुनवाई के लिए कह सकते हैं। आपको बता दें कि जिस अपील की हम बात कर रहे हैं वह 1960 के दशक के अंत या 70 की शुरुआत में हुआ था। हालांकि इस मामले में निचली अदालत ने फैसला जल्‍द सुना दिया था, जिसके खिलाफ दोषी ने हाईकोर्ट में अपील की थी। यही अपील आज तक लंबित है।

न्‍यायिक प्रणाली के लिए बेहद शर्मनाक बात

हमारी न्‍यायिक प्रणाली के लिए यह बेहद शर्मनाक बात है कि इस तरह का कोई एक मामला नहीं है बल्कि सुप्रीम कोर्ट में दायर इस रिपोर्ट में ऐसे करीब 14 मामलों को इंगित किया गया है। यह सभी मामले 1976 से 1978 के बीच में दायर किए गए थे। इनमें से 1976 में दो, 1977 में चार और 1978 में ऐसे करीब आठ मामले दायर किए गए थे। आपको बता दें कि पिछले तीस वर्षों से इलाहाबाद हाईकोर्ट 13600 क्रिमीनल अपील लंबित हैं। यह देश की उस हाईकोर्ट का हाल है जहां पर सबसे अधिक जज मौजूदा समय में भी नियुक्‍त हैं। इस हाईकोर्ट में 160 जजों की स्‍ट्रेंथ है लेकिन फिलहाल यहां पर 106 जज काम कर रहे हैं। वहीं देशभर में लंबित मामलों की बात करें तो इनकी संख्‍या हजारों में नहीं बल्कि लाखों में हैं। मौजूदा समय में देशभर के 24 हाईकोर्ट में करीब 40.15 लाख मामले लंबित है वहीं हाईकोर्ट करीब 44 फीसद जजों की कमी से जूझ रहे हैं।

हाईकोर्ट ने बताई है ये वजह

बहरहाल जिस रिपोर्ट में इस हाईकोर्ट के लंबित मामलों का जिक्र किया गया है इसमें लंबित मामलों के पीछे भी जजों की कमी को बड़ी वजह बताया गया है। दो जजों की खंडपीठ के समक्ष दायर इस रिपोर्ट में हाईकोर्ट की तरफ से यहां तक कहा गया है कि किसी अपील को अपने अंजाम तक पहुंचने में ग्‍यारह वर्षों से अधिक का समय लगता है। लेकिन यदि मामलों पर नजर डालें तो अपील पर फैसला होने में करीब 20 वर्षों का समय लगा है। इसके अलावा यह भी कहा गया है हाईकोर्ट में केस का लगातार बढ़ता बोझ और वकीलों का मामले के निपटारे को लेकर कम झुकाव भी इसके लिए जिम्‍मेदार है। इतना ही नहीं हाईकोर्ट ने अपने यहां पर इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर की कमी, कर्मियों की कमी, तकनीक का अभाव की तरफ भी ध्‍यान आकर्षित किया है।

ये है ताजा हाल

आपको यहां पर बता दें कि इंडियन जूडिशरी की एनवल रिपोर्ट 2015-16 के मुताबिक देशभर के हाईकोर्ट में जजों की संख्‍या 1079 होनी चाहिए लेकिन इनकी जगह पर महज 608 जज ही काम कर रहे हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक 29,31,352 सिविल केस, 11,23,178 क्रिमीनल केस लंबित थे। वहीं 7,43,191 मामलों को करीब एक दशक बीत चुका था जिन पर कोर्ट फैसला नहीं ले सका था। वहीं सरकार की 2017 में जो रिपोर्ट सामने आई उसके मुताबिक 17 जुलाई 2017 तक सुप्रीम कोर्ट में 62537 मामले लंबित थे। इसमें 48772 सिविल और 9666 क्रिमीनल केस शामिल हैं।

निचली अदालत में बढ़ रहे लंबित मामले

वहीं हाईकोर्ट की यदि बात करें तो देशभर के 24 हाईकोर्ट में 40.15 लाख मामले लंबित हैं। इसके अलावा निचली अदालत में लंबित मामलों की संख्‍या लगातार बढ़ रही है। जून 2017 तक इन अदालतों में 2.74 करोड़ है। जहां हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जजों की कमी से जूझ रही हैं वहीं निचली अदालत भी इससे अछूती नहीं रही हैं। कानून मंत्रालय की रिपोर्ट बताती है कि निचली अदालतों में जजों की तादाद करीब 20 हजार होनी चाहिए जबकि यहां पर 4937 जजों की कमी चल रही है। हालांकि यह रिपोर्ट ये भी बताती है कि लंबित मामले विभिन्‍न कोर्ट में लगातार कम हो रहे हैं, इसके बाद भी यह कहना गलत नहीं होगा कि लंबित मामलों की तादाद आज भी काफी है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here