भारत को आजाद हुए 70 साल से ज्यादा का वक्त गुजर चुका है। पिछले लगभग इतने ही सालों से देश में हर साल बजट भी पेश किया जा रहा है। हर बार के बजट में लोगों को बड़ी उम्मीदें टैक्स स्लैब से होती हैं। इस तरह से कहा जाए तो भारत के करदाता भी 70 साल का लंबा सफर तय कर चुके हैं। बजट पेश किए जाने का वक्त एक ऐसा समय होता है जब सबसे ज्यादा बात इनकम टैक्स रेप पर होती है। हर किसी को उम्मीद होती है कि इस बार वित्त मंत्री टैक्स स्लैब को थोड़ा ऊपर बढ़ाकर आम लोगों को राहत देंगे। हालांकि ज्यादातर मौकों पर वित्त मंत्री जनता निराश ही करते आए हैं। आखिरी बार डायरेक्ट बजट स्ट्रक्च में बड़ा बदलाव 1997 में हुआ था और उस समय पी. चिदंबरम वित्त मंत्री थे। उस बजट को ड्रीम बजट भी कहा जाता है। इस बार भी देश के आम लोगों को वित्त मंत्री अरुण जेटली से ढेरों उम्मीदें हैं। चलिए जानते हैं आजादी के बाद भारत में टैक्स स्लैब में कैसे-कैसे बदलाव हुआ है।

1949-50 का बजट: भारत के आजाद होने के बाद पहली बार इसी बजट में टैक्स की दरें तय की गई थीं। उस समय के वित्त मंत्री जॉन मथाई ने 10000 रुपये तक की आमदनी पर लग रहे 1 आने के टैक्स में से एक थौथाई हिस्से की कटौती कर दी थी। वहीं, 10000 रुपये से ज्यादा के दूसरे स्लैब पर लग रहे 2 आने के टैक्स को घटाकर 1.9 आना कर दिया था।

1974-75 का बजट: उस समय देश के वित्त मंत्री यशवंत राव चव्हाण थे। चव्हाण ने 97.75 फीसद के टैक्स को घटाकर 75 फीसद कर दिया। यही नहीं उन्होंने सभी तरह की व्यक्तिगत आय पर लग रहे टैक्स रेट्स को भी कम कर दिया। इस साल 6000 रुपये तक की सालाना आमदनी को टैक्स स्लैब से बाहर करने का फैसला लिया गया। 70000 रुपये से ज्यादा की सालाना कमाई पर 70 फीसद का मार्जिनल टैक्स रेट तय किया गया। इसके अलावा सभी श्रेणियों पर सरचार्ज एक समान 10 फीसद कर दिया गया। सरचार्ज के साथ सबसे ऊपरी स्तर वाले स्लैब पर इनकम टैक्स और सरचार्ज मिलाकर कुल 77 प्रतिशत का टैक्स हो गया। यही नहीं, इस बजट में वेल्थ टैक्स बढ़ा दिया गया था।

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